Top

आखिर क्या चल रहा है यूपी में : भाजपा बता रही ऑल इज वेल, सियासी माहौल दे रहा अलग संदेश

आखिर क्या चल रहा है यूपी में : भाजपा बता रही ऑल इज वेल, सियासी माहौल दे रहा अलग संदेश

  • नाराज विधायक विधान सभा चुनाव में गड़बड़ा सकते हैं भाजपा का गणित
  • बैठकों के दौर से बदलाव की चर्चाएं तेज रिस्क लेने से डर रहा शीर्ष नेतृत्व

4पीएम न्यूज नेटवर्क. लखनऊ। विधान सभा चुनाव से पहले यूपी में सियासी हलचल तेज हो चुकी है। योगी सरकार को लेकर दिल्ली से लखनऊ तक बैठकों का दौर चला और आखिर में भाजपा नेताओं ने प्रदेश में ऑल इज वेल का बयान देकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की। इन बयानों के बाद भी जिस तरह से सियासी गलियारों में चर्चाएं गर्म हैं, वह कुछ अलग संदेश दे रही हैं। माना जा रहा है कि अगर शीर्ष नेतृत्व ने समय रहते कोई विकल्प पेश नहीं किया तो भाजपा के नाराज विधायक चुनाव में पार्टी का गणित बिगाड़ सकते हैं। दूसरी ओर चुनाव से पहले पार्टी का शीर्ष नेतृत्व सरकार में बड़े बदलाव कर किसी प्रकार का रिस्क लेने से डर रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब प्रदेश में सब कुछ ठीक चल रहा है तो फिर दिल्ली से लखनऊ तक हुई मैराथन बैठकों की जरूरत क्यों पड़ी? कोरोना प्रबंधन से उपजे असंतोष, पंचायत चुनाव के नतीजों और विधायकों की नाराजगी ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की चिंताएं बढ़ा दी हैं। विपक्षी दलों, खासकर सपा और कांग्रेस ने संक्रमण में कुप्रबंधन का आरोप लगाते हुए योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। ऐसे में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इससे संभावित नुकसान को लेकर अलर्ट हो गया है और माहौल को दुरुस्त करने के जतन में जुटा है। इसी क्रम में दिल्ली से लेकर लखनऊ तक बैठकों का दौर चला। प्रदेश सरकार और संगठन में बड़े बदलाव और नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं गर्म हो गयीं। भाजपा के महामंत्री (संगठन) बीएल संतोष तीन दिन के लिए यूपी दौरे में रहे। उन्होंने मंत्रियों और विधायकों से फीडबैक लिया। कई नेताओं ने नाराजगी भी जताई।

24 मई की शाम दत्तात्रेय होसबले और सुनील बंसल लखनऊ पहुंच थे, जहां दोनों नेताओं ने अलग-अलग बैठक की थी। सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले 26 मई को वापस लौट गए। लखनऊ के दो दिन के प्रवास के दौरान न तो होसबले की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और न ही भाजपा प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह समेत किसी प्रमुख राजनेता से मुलाकात हुई। इससे साफ हो गया कि प्रदेश में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और नेतृत्व में बड़ा बदलाव हो सकता है। दरअसल, सीएम योगी को लेकर शीर्ष नेतृत्व जल्दीबाजी में कोई फैसला लेने का रिस्क नहीं उठाना चाहता है। भाजपा सूत्रों के मुताबिक चुनाव से पहले नेतृत्व में बदलाव से अच्छा संदेश नहीं जाएगा। इससे पार्टी को नुकसान भी हो सकता है इसलिए भाजपा इस कोशिश में भी है कि बाहर से किसी तरह का विवाद न दिखे। फिलहाल, रविवार को जब भाजपा के यूपी प्रभारी राधामोहन सिंह राज्यपाल आनंदीबेन पटेल मिलने से पहुंचे तो कैबिनेट बदलाव की चर्चा फिर से तेज हो गई लेकिन उन्होंने साफ कर दिया कि कैबिनेट विस्तार के फैसले का विशेषाधिकार सीएम के पास ही है। भले ही भाजपा नेतृत्व सब कुछ ठीक होने का दावा कर रहा हो लेकिन प्रदेश भाजपा में अंदरखाने घमासान चल रहा है। कई मंत्रियों पर भ्रष्टïाचार के आरोप लगने के कारण सरकार की छवि को धक्का लगा है। वहीं अफसरशाही के हावी होने के कारण तमाम विधायक भी सरकार से नाराज चल रहे हैं। जाहिर है, शीर्ष नेतृत्व के सामने सभी को साधने की बड़ी चुनौती है।



पीएम की बैठक में नहीं शामिल थे सीएम

उत्तर प्रदेश के सियासी हालात को लेकर 23 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले की अहम बैठक हुई। इसमें उत्तर प्रदेश भाजपा प्रदेश संगठन के महामंत्री सुनील बंसल भी शामिल थे, लेकिन सीएम योगी आदित्यनाथ नहीं थे। यह भी इशारा करता है कि प्रदेश में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है और सीएम के तमाम फैसलों से शीर्ष नेतृत्व भी चिंतित है।

योगी को है आरएसएस का समर्थन

सीएम योगी आदित्यनाथ के समर्थन में एक और अहम तथ्य यह है कि तमाम विरोधों के बावजूद वह संघ की पहली पसंद बने हुए हैं जबकि वह खुद आरएसएस की पृष्ठभूमि से नहीं आते हैं। कहा जाता है कि 2017 में भी आरएसएस के समर्थन से ही वह सीएम पद की कुर्सी पर आसीन हुए थे जबकि अमित शाह और पीएम मोदी खुद योगी को लेकर बहुत निश्ंिचत नहीं थे।

कमियों को नजरअंदाज करना पड़ रहा भारी

क्या भाजपा के पास योगी का कोई विकल्प नहीं है? राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यह दावा करना जल्दबाजी होगी कि भाजपा विकल्पहीन है। मनोज सिन्हा से लेकर राजनाथ सिंह तक कई नेताओं को सीएम चेहरे के रूप में पेश करने की चर्चा 2017 के चुनाव में भी हुई थी लेकिन सच यह भी है कि सीएम के रूप में योगी आदित्यनाथ की छवि मजबूत हुई है। योगी को बनाए रखना अगर भाजपा की मजबूरी है तो इसके पीछे वजह कहीं न कहीं खुद पार्टी हाई कमान ही है। जब योगी के कामकाज के तरीके पर सवाल उठे तब पार्टी ने फायरब्रांड के रूप में उनकी छवि को देखते हुए कमियों को नजरअंदाज किया। आज जब चुनाव सिर पर हैं तब पार्टी कोई भी रिस्क लेने से परहेज कर रही है।

सरकार और संगठन मिलकर अच्छा काम कर रहे हैं। मंत्रिमंडल में जो पद खाली हैं, वो भरे जाएंगे। खाली पदों पर मुख्यमंत्री निर्णय लेंगे। पंचायत चुनाव में हमारे बहुत से कार्यकर्ता जीते हैं। संगठन और सरकार अच्छी तरह चल रही है। कुछ सीटें खाली हैं जिसे लेकर उचित समय पर मुख्यमंत्री निर्णय लेंगे।

राधा मोहन सिंह, यूपी प्रभारी, भाजपा

Next Story
Share it