बेसिक शिक्षा का गिरता स्तर और सरकारी तंत्र

सवाल यह है कि बेसिक शिक्षा की गिरती स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या बेसिक शिक्षा विभाग बच्चों की शिक्षा को लेकर गंभीर नहीं है? क्या शिक्षकों और अन्य संसाधनों की कमी के कारण ये हालात पैदा हुए हैं? क्या प्रशिक्षित व योग्य शिक्षकों की कमी के चलते बेसिक शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है? क्या बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करने की छूट किसी को दी जा सकती है?

Sanjay Sharma

तमाम दावों के बावजूद प्रदेश में बेसिक शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। सर्वे ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट के मुताबिक लखनऊ के प्राइमरी पाठशालाओं में पढऩे वाले कक्षा एक के 41 फीसदी बच्चे अक्षर जबकि 32.9 फीसदी बच्चे शब्द नहीं पढ़ पाते हैं। वहीं कक्षा तीन के 23.6 फीसदी बच्चे अक्षर पढऩे में नाकाम हैं। कक्षा एक के 28.1 प्रतिशत बच्चे एक से नौ तक के अंक नहीं पहचानते हैं तो कक्षा तीन में ऐसे 6.7 फीसदी बच्चे हैं। जब राजधानी में बेसिक शिक्षा का यह हाल है तो अन्य जिलों का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। सवाल यह है कि बेसिक शिक्षा की गिरती स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या बेसिक शिक्षा विभाग बच्चों की शिक्षा को लेकर गंभीर नहीं है? क्या शिक्षकों और अन्य संसाधनों की कमी के कारण ये हालात पैदा हुए हैं? क्या प्रशिक्षित व योग्य शिक्षकों की कमी के चलते बेसिक शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है? क्या बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करने की छूट किसी को दी जा सकती है? क्या पूरी शिक्षा व्यवस्था को बदलने की जरूरत है?
बेसिक शिक्षा पर आई ताजा रिपोर्ट गंभीर चिंता का विषय है। करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी प्रदेश में बेसिक शिक्षा की स्थिति गिरती जा रही है। इसके लिए कई कारण जिम्मेदार हैं। हकीकत यह है कि अधिकांश प्राइमरी स्कूलों में संसाधनों की कमी है। कई स्कूल जर्जर भवनों में चल रहे हैं और यहां बच्चों के बैठने तक की व्यवस्था नहीं है। ये विद्यालय शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। जहां शिक्षक हैं भी तो वे बच्चों के लिए मिड-डे-मील उपलब्ध कराने में ही व्यस्त दिखाई पड़ते हैं। यहां शिक्षा के नाम पर खानापूर्ति की जाती है। खुद शिक्षक तक समय से स्कूलों में नहीं पहुंचते हैं। कुछ स्कूलों में शिक्षक अपनी जगह बाहरी व्यक्ति को पढ़ाने की जिम्मेदारी देकर अन्य कामों में व्यस्त रहते हैं। ऐसे कई मामले प्रकाश में आ चुके हैं। वहीं बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से इन बच्चों को समय पर पुस्तकें तक नहीं उपलब्ध नहीं कराई जाती हैं। लिहाजा बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है। तमाम शिकायतों के बावजूद स्थितियों में कोई बदलाव नहीं आ सका है। ऐसी स्थिति में बच्चों को गुणवत्ता युक्त शिक्षा उपलब्ध कराना किसी सपने से कम नहीं है। यदि सरकार गुणवत्ता युक्त शिक्षा उपलब्ध कराना चाहती है तो उसे न केवल प्राथमिक पाठशालाओं में जरूरी संसाधनों की व्यवस्था करनी होगी बल्कि बच्चों की शिक्षा की लगातार मानीटरिंग करने की भी व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। इसके अलावा लापरवाह शिक्षकों को चिन्हित कर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी होगी। अन्यथा बेसिक शिक्षा को रसातल में जाने से नहीं रोका जा सकता है।

Loading...
Pin It

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Time limit is exhausted. Please reload the CAPTCHA.