बसपा की राह में कांटे बिछाएगी भीम आर्मी दलित वोट बैंक में सेंध लगाने की तैयारी

  • दलित आंदोलन से उत्पन्न भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर करेंगे सियासी पारी का आगाज
  • पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दलितों पर है खासा प्रभाव, बसपा प्रमुख की चिंता बढ़ी
  • दलित वोट बैंक में बिखराव से बसपा के सियासी अस्तित्व पर गहरा सकता संकट

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलितों का बड़ा चेहरा बनकर उभरे भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद अब सियासी पारी शुरू करने की तैयारी में हैं। वे जल्द ही पार्टी का गठन करने जा रहे हैं। चंद्रशेखर के सियासी मैदान में उतरने से बसपा की मुश्किलें बढऩी तय हैं क्योंकि इससे दलित वोट बैंक खिसकेगा। भीम आर्मी के संस्थापक के ताजा ऐलान से बसपा के दिग्गजों की धडक़ने बढ़ गई हैं। यदि भीम आर्मी सियासी मैदान में उतरी तो बसपा के राजनीतिक अस्तित्व पर संकट और गहरा जाएगा।
2012 के बाद से उत्तर प्रदेश सरकार से बाहर चल रही बसपा के लिए चुनावी राजनीति में अब एक और चुनौती पैदा हो गई है। बीते कुछ सालों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित आंदोलन से पैदा हुई भीम आर्मी के चुनावी समर में उतरने के ऐलान से सबसे ज्यादा बसपा की चिंता बढ़ी है। भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आजाद पिछले कुछ वर्षों में सहारनपुर, मेरठ समेत पश्चिमी यूपी में दलित आंदोलन का चेहरा बनकर उभरे हैं। खासतौर पर बहुजन राजनीति में ऐसे लोग चंद्रशेखर के पीछे आए, जिन्हें लगता है कि बसपा अब दलितों के हितों के लिए पहले की तरह समर्पित नहीं रही। ऐसे में अब चंद्रशेखर का सियासत में प्रवेश बसपा के ही दलित वोट बैंक में सेंध लगाने का काम करेगी। वहीं चंद्रशेखर से दूरी बनाती रहीं बसपा प्रमुख मायावती के लिए उनसे निपटना इसलिए मुश्किल होगा क्योंकि वह उनके ही उस अंदाज को कॉपी कर रहे हैं, जिस स्टाइल की राजनीति वह कभी करती थीं। बहुजन से सर्वजन की अपनी सियासी सफर के दौरान मायावती की छवि में काफी बदलाव देखने को मिला है। इसे भीम आर्मी ने मिशन से भटकने वाला करार दिया है। 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा के हाथों हारने, फिर 2014 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट न जीतने से लेकर 2017 में राज्य में महज 18 सीटें हासिल करने वाली बसपा के लिए यह बड़ी चुनौती है। इसके अलावा बसपा 2019 के लोक सभा चुनाव में सपा से गठबंधन करने के बाद भी कोई खास प्रदर्शन नहीं कर सकी। उसे प्रदेश की 80 लोक सभा सीटों में से महज दस सीटें मिली। यही नहीं सपा से गठबंधन तोडक़र बसपा ने प्रदेश की 12 विधान सभा सीटों पर अकेले दम पर चुनाव लड़ा लेकिन वह अपना खाता भी नहीं खोल सकी। यही नहीं उनका वोट बैंक इतना खिसक गया कि वे कई सीटों पर कांग्रेस से भी पीछे रह गई। ऐसे में चंद्रशेखर की सियासत में इंट्री बसपा को दलित वोट बैंक से दूर कर सकती है।

पहले भाजपा लगा चुकी है सेंध

उत्तर प्रदेश में भाजपा ने गैर-यादव पिछड़ा और गैर-जाटव दलित के समीकरण पर फोकस करते हुए 2014 से लेकर अब तक बड़ी सफलता हासिल की है। मायावती के सिमटने की वजह यही रही कि एक समय समूचे दलित समाज की पार्टी कहलानी वाली बसपा का गैर-जाटव दलित वोट ही उससे छिटकता दिखा। अब चंद्रशेखर की एंट्री उस जाटव वोट बैंक को भी मायावती से दूर कर सकती है।

एक वोट एक नोट पर रखेंगे पार्टी की नींव

2017 में सहारनपुर के हिंसा के बाद सुर्खियों में आई भीम आर्मी और उसके संस्थापक चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि सियासी दल के गठन की तैयारी पूरी है। नए दल में ईमानदार और समर्पित युवा की भागीदारी रहेगी। नई पार्टी में आंबेडकरवादी युवाओं को आगे बढऩे का मौका देंगे। उनमें नेतृत्व विकसित करेंगे। बहुजन समाज के काफी नौजवान लंबे वक्तसे जेल काट रहे हैं। वे समाज के सच्चे हितेषी हैं। कांशीराम का एक वोट एक नोट वाले फॉम्र्युले पर पार्टी को खड़ा करेंगे। उन्होंने कहा कि नए सियासी दल का ऐलान नए साल की शुरुआत में करेंगे। माना जा रहा है कि कांशीराम का जन्मदिन 15 मार्च को है, उस दिन या उससे पहले घोषणा मुमकिन है। चंद्रशेखर ने कहा बसपा मुद्दों से भटक गई हैं। हमने मायावती को सियासी लड़ाई मिलकर लडऩे के लिए पत्र लिखा था, लेकिन उन्होंने जवाब नहीं गिया। अब भी अगर मायावती चाहे तो हमारे सियासी दल संग मिलकर संघर्ष कर सकती हैं।

 

 

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