किसानों की समस्याओं का समाधान कब?

सवाल यह है कि हर बार किसानों को अपने हक के लिए सडक़ पर क्यों उतरना पड़ता है? क्या कृषि नीतियां और नौकरशाही किसानों का भला करने में नाकाम साबित हो रही हैं? क्यों आज भी बिचौलिए किसानों की मेहनत की कमाई लूट रहे हैं? सरकारी क्रय केंद्रों पर किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए कई-कई दिनों तक इंतजार क्यों करना पड़ रहा है? चीनी मिलें बकाया भुगतान करने में आनाकानी क्यों कर रही हैं?

Sajay Sharma

विभिन्न मांगों को लेकर प्रदेश के किसान एक बार फिर सडक़ों पर उतरे। राजधानी लखनऊ में किसानों ने गन्ना व धान की फसल जलाकर सरकार का ध्यान अपनी समस्याओं की ओर आकर्षित करने की कोशिश की। सवाल यह है कि हर बार किसानों को अपने हक के लिए सडक़ पर क्यों उतरना पड़ता है? क्या कृषि नीतियां और नौकरशाही किसानों का भला करने में नाकाम साबित हो रही हैं? क्यों आज भी बिचौलिए किसानों की मेहनत की कमाई लूट रहे हैं? सरकारी क्रय केंद्रों पर किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए कई-कई दिनों तक इंतजार क्यों करना पड़ रहा है? चीनी मिलें बकाया भुगतान करने में आनाकानी क्यों कर रही है? नौकरशाही और मिल मालिकों के बीच गन्ना किसान पिस क्यों रहे हैं? क्या किसानों को फसल का वाजिब मूल्य नहीं मिलना चाहिए? बिना लागत और बाजार मूल्य को जाने फसल का समर्थन मूल्य घोषित करने को क्या उचित कहा जा सकता है?
पूरे देश में किसानों की हालत खराब है। उत्तर प्रदेश भी इससे अछूता नहीं है। किसानों की इस बदहाली के लिए अव्यवहारिक कृषि नीति और लापरवाह नौकरशाही जिम्मेदार है। फसलों का समर्थन मूल्य बिना किसी तार्किक आधार के घोषित कर दिया जाता है। लिहाजा किसानों को फसल का लागत मूल्य तक नहीं मिल पाता है। गन्ना किसानों की हालत और भी खराब है। चीनी मिल संचालक किसानों का करोड़ों रुपये दबाकर बैठे हैं। सरकार के आदेश के बावजूद चीनी मिलें बकाया भुगतान करने में आनाकानी करती हैं। दूसरी ओर नौकरशाही भी किसानों की समस्याओं को लेकर गंभीर नहीं है। धान, गन्ना व अन्य फसलों के लिए सरकारी क्रय केंद्र खोले गए हैं लेकिन यहां बिचौलियों का राज चलता है। इन केंद्रों पर फसल की बिक्री के लिए किसानों को कई-कई दिनों तक इंतजार करना पड़ता है। लिहाजा वे अपनी फसल औने-पौने दामों पर बेचने को मजबूर हो जाते हैं और यह सारा खेल बिचौलियों और क्रय केंद्रों के संचालकों की मिलीभगत से खेला जाता है। ऐसी स्थिति में किसानों की आर्थिक हालत बेहद खराब हो जाती है। फसल का वाजिब दाम नहीं मिलने के कारण वे अगली फसल बोने के लिए कर्ज लेते हैं और इस तरह वे कर्ज के मकडज़ाल में उलझते चले जाते हैं। यदि सरकार किसानों की बेहतरी चाहती है तो उसे न केवल कृषि नीति को व्यवहारिक बनाना होगा बल्कि लागत के सापेक्ष और बाजार की कीमतों को देखते हुए फसलों का समर्थन मूल्य घोषित करना होगा। किसानों को कर्ज के मकडज़ाल से निकालना होगा। साथ ही चीनी मिलों से बकाए का भुगतान कराना भी सुनिश्चित करना होगा।

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