गंगा प्रदूषण पर कोर्ट की सख्ती के मायने

सवाल यह है कि जन हित के हर मुद्दे पर कोर्ट को हस्तक्षेप क्यों करना पड़ता है? आखिर सरकार और नौकरशाही अपने उत्तरदायित्वों को पूर्ण करने में नाकाम क्यों साबित हो रही है? अरबों रुपये खर्च होने के बावजूद गंगा को आज तक प्रदूषण से मुक्त क्यों नहीं किया जा सका? नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए जरूरी कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं?

sanjay sharma

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंगा प्रदूषण को लेकर न केवल अपनी चिंता जाहिर की है बल्कि सरकार से नमामि गंगे प्रोजेक्ट की कार्य प्रगति की रिपोर्ट भी तलब की है। कोर्ट ने पूछा है कि गंगा में नाले का गंदा पानी क्यों गिर रहा है? उसके रोकने के उपाय क्यों नहीं किए गए हैं? सवाल यह है कि जन हित के हर मुद्दे पर कोर्ट को हस्तक्षेप क्यों करना पड़ता है? आखिर सरकार और नौकरशाही अपने उत्तरदायित्वों को पूर्ण करने में नाकाम क्यों साबित हो रही है? अरबों रुपये खर्च होने के बावजूद गंगा को आज तक प्रदूषण से मुक्त क्यों नहीं किया जा सका? नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए जरूरी कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं? बिना शोधन के नालों का पानी नदियों में गिरने से क्यों नहीं रोका जा रहा है? नौकरशाही का इतना भारी-भरकम अमला आखिर कर क्या रहा है? क्या भ्रष्टïाचार के घुन ने पूरी व्यवस्था को खोखला कर दिया है? क्या नदियों को निर्मल करना सरकार का दायित्व नहीं है?
गंगा ही नहीं देश की तमाम नदियां प्रदूषण की मार से कराह रही हैं। उनमें सैकड़ों नालों का सीवर युक्त पानी गिर रहा है। गंगा की सहयोगी यमुना नाले में तब्दील हो चुकी है। गोमती नदी का पानी आचमन लायक नहीं बचा है। यही हाल अन्य नदियों का भी है। जहां तक गंगा का सवाल है तो इसको स्वच्छ करने के लिए कई दशकों से अभियान चल रहा है। केंद्र सरकार गंगा को अविरल और निर्मल करने के लिए नमामि गंगे योजना चला रही है। गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए अब तक अरबों रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन आज भी कई स्थानों पर गंगा का पानी बेहद प्रदूषित है। कानपुर में गंगा का पानी उपयोग लायक नहीं बचा है। यही नहीं गंगा में एसटीपी से शुद्ध हुए पानी में बायोकेमिकल पॉलीफॉर्म भी गंगा में मिलकर प्रदूषण फैला रहे हैं। प्रयागराज में छह एसटीपी स्थापित हैं लेकिन ये ठीक से काम नहीं कर रहे। 83 नालों में से 43 नाले सीधे गंगा में गिर रहे हैं। वहीं कानपुर के चमड़ा उद्योगों को आज तक स्थानांतरित नहीं किया जा सका है। लिहाजा इन उद्योगों का केमिकल युक्त गंदा पानी सीधे गंगा में गिर रहा है। इसके कारण प्रदूषण लगातार बढ़ता जा रहा है। जाहिर है, योजना अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में नाकाम साबित हो रही है। यदि सरकार गंगा को स्वच्छ और निर्मल करना चाहती है तो उसे न केवल योजना को धरातल पर उतारना होगा बल्कि प्रदूषण फैला रहे उद्योगों पर भी नकेल कसनी होगी। साथ ही इस मामले में लापरवाह अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी होगी। इसके अलावा सरकार को गंगा के साथ इसकी सहयोगी नदियों को भी प्रदूषण मुक्त करना होगा।

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