महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध, समाज व पुलिस

सवाल यह है कि महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों पर लगाम क्यों नहीं लग पा रही है? क्या समाज इन अपराधों के लिए जिम्मेदार नहीं है? क्या पुलिस का रवैया अपराधियों के हौसलों को बढ़ा रहा है? क्या पूरे सिस्टम में बदलाव की जरूरत है? क्या कठोर दंड विधान के बिना ऐसी घटनाओं को रोकना मुमकिन है? देवी की पूजा करने वाले देश में महिलाओं के प्रति जघन्य अपराध क्यों हो रहे हैं?

Sanjay sharnna
हैदराबाद में एक चिकित्सक की गैंगरेप के बाद हत्या से पूरा देश आक्रोशित है। संसद से सडक़ तक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। आरोपियों को फांसी देने की मांग की जा रही है। यह घटना महिलाओं के प्रति बढ़ रहे अपराधों की एक बानगी भर है। सवाल यह है कि महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों पर लगाम क्यों नहीं लग पा रही है? क्या समाज इन अपराधों के लिए जिम्मेदार नहीं है? क्या पुलिस का रवैया अपराधियों के हौसलों को बढ़ा रहा है? क्या पूरे सिस्टम में बदलाव की जरूरत है? क्या कठोर दंड विधान के बिना ऐसी घटनाओं को रोकना मुमकिन है? देवी की पूजा करने वाले देश में महिलाओं के प्रति जघन्य अपराध क्यों हो रहे हैं? क्या अदालतों की सुस्त गति से स्थितियां और खराब हो रही है?
पूरे देश में महिलाओं के प्रति अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। आए दिन बलात्कार, हत्या, अपहरण, छेड़छाड़ जैसी घटनाएं घट रही हैं। इन अपराधों के लिए कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं है। पूरा सिस्टम जिम्मेदार है। पुलिस की हालत यह है कि वह अपराध हो जाने के बाद मौके पर पहुंचती है। कहने को हेल्प लाइन नंबर है लेकिन अधिकांश बार पुलिसकर्मियों द्वारा फोन उठाया नहीं जाता है। अगर उठा लिया गया तो पुलिस मौके पर इतनी देर से पहुंचती है कि अपराधी वारदात को अंजाम देकर आसानी से फरार हो जाता है। इसके बाद लीपापोती की कोशिश शुरू हो जाती है। कई बार पुलिसकर्मी खुद आरोपियों से मिले होते हैं। ऐसी रिपोर्ट तैयार की जाती है कि सजा मिलनी मुश्किल हो जाती है। सच यह है कि जब तक किसी घटना पर पूरा देश आक्रोशित नहीं हो जाता पुलिस की सक्रियता नहीं दिखाई देती है। मसलन जब हैदराबाद मामले ने तूल पकड़ा तो पुलिस सक्रिय हो गई और आरोपियों को आनन-फानन में सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। यही नहीं अदालतों में वर्षों केस चलते हैं और अधिकांश रेप के मामलों में आरोपी को सख्त सजा नहीं मिल पाती है। महिला अपराधों के बढऩे के पीछे समाज भी कम जिम्मेदार नहीं है। आज भी देश के अधिकांश घरों में बेटे-बेटी के बीच भेदभाव व्याप्त है। इस सामंती सोच ने महिलाओं को कमतर और उपभोग की वस्तु बना दिया है। घरेलू हिंसा इसका दूसरा पहलू है। महिलाओं के प्रति सम्मान का भाव नहीं होने के कारण ऐसे अपराध बढ़ रहे हैं। यदि ऐसे अपराधों पर नियंत्रण लगाना है तो न केवल समाज में महिला सम्मान को स्थापित करना होगा बल्कि इसे हर मां को अपने बेटे को सिखाना भी होगा। वहीं सरकार को ऐसे केसों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में कराना सुनिश्चित करना होगा ताकि दोषी को तुरंत और कठोर सजा मिल सके। वहीं पुलिस तंत्र में व्याप्त भ्रष्टïाचार और लापरवाही को खत्म करना होगा।

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