‘धर्मांतरण के बाद घर वापसी अपराध नहीं’

  • राज्य विधि आयोग के अध्यक्ष ने सीएम को सौंपा ड्राफ्ट
  • व्यक्ति को खुद साबित करना होगा जबरन नहीं करवाया परिवर्तन

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। उत्तर प्रदेश राज्य विधि आयोग ने धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर ड्रॉफ्ट सीएम योगी आदित्यनाथ को सौंप दिया है। आयोग के अध्यक्ष एएन मित्तल ने गुरुवार को सीएम से उनके आवास पर मिलकर यह ड्रॉफ्ट सौंपा। ड्रॉफ्ट में धर्मांतरण कराने पर सख्त सजा की सिफारिश की गई है। इसमें सात साल तक जेल और आर्थिक दंड भी प्रस्तावित है। आयोग ने मुख्य रूप से अपने प्रस्ताव में कहा है कि यदि किसी व्यक्ति ने कुछ साल पहले धर्म परिवर्तन करके कोई और धर्म अपना लिया था और अब वह ‘घर वापसी’ (अपने पुराने धर्म में दोबारा वापसी) करना चाहता है तो उसे अपराध नहीं माना जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया को धर्म परिवर्तन कानून के दायरे में नहीं माना जाएगा। आयोग के अध्यक्ष ने इसके लिए मुख्यमंत्री को एक चिट्ठी भी लिखी है, जिसमें कहा गया है कि मुख्यमंत्री ने खुद 13 दिसंबर, 2014 को एक साक्षात्कार में कहा था कि घर वापसी के लिए किए जा रहे प्रयास सर्वथा उचित हैं। आयोग ने अपने प्रस्ताव में विधानसभा में इस पर उठे सवालों, उनके जवाबों को भी शामिल किया है।
राज्य विधि आयोग ने जिस कानून को बनाने की सिफारिश की है उसमें कड़े प्रावधान किए गए है। इसमें कहा गया है कि अगर आप पर जबरन, छल या पैसा देकर धर्मांतरण कराने का आरोप लगा तो इसके सुबूत आपको खुद ही जुटाने होंगे कि आपने धर्मांतरण जबरन या छल से नहीं कराया है। इसके तहत अगर आपने किसी का धर्मांतरण कराने में मदद की तो आप को ही जिम्मेदार माना जाएगा। अगर धर्मांतरण में मदद की, या धर्मांतरण की जानकारी होने के बावजूद प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं दी तो उसे भी आपका ही अपराध माना जाएगा।

शपथ पत्र के बाद कर सकेंगे धर्मांतरण

आयोग ने यह भी सिफारिश की है कि अगर कोई भी व्यक्ति धर्मांतरण करना चाहता है तो वह पहले जिलाधिकारी या उसके द्वारा नामित अपर जिलाधिकारी को एक महीने पहले शपथ पत्र देगा कि वह धर्मांतरण करना चाहता है। यह भी घोषित करना होगा कि यह धर्मांतरण छल, जबरन या की प्रभाव में नहीं किया जा रहा है। इसके लिए डीएम कार्यालय में यहां प्रस्तावित फार्म में यह घोषणा करनी होगी। इसमें धर्मांतरण कराने वाले धर्मगुरु को भी डीएम के यहां प्रस्तावित फार्म भरकर एक महीने की नोटिस देनी होगी। डीएम सभी दी गई जानकारियों की पुलिस के जरिए छान-बीन करेगा और अगर वह पुलिस रिपोर्ट से संतुष्ट होता है कि धर्मांतरण के पीछे कोई छल, पैसा या जबर्दस्ती नहीं शामिल है, तभी वह आगे की अनुमति दे सकता है।

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