हिमस्खलन से शहीद होते जवानों की चिंता कब ?

सवाल यह है कि बीस हजार फुट की ऊंचाई पर बसे सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात जवानों की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम आज तक क्यों नहीं किया गया? बर्फीले तूफान के आने की चेतावनी का कोई सिस्टम क्यों नहीं विकसित किया गया? क्या जवानों को ऐसी कठिन परिस्थिति से निपटने के लिए अकेला छोड़ा जा सकता है?

sanjay Sharma

सियाचीन ग्लेशियर में हिमस्खलन की चपेट में सेना के आठ जवान आ गए। इसमें चार जवान शहीद हो गए जबकि उनका सामान लेकर जा रहे दो अन्य लोगों की भी मौत हो गई। शेष चार जवानों की हालत गंभीर है और उनका इलाज चल रहा है। सवाल यह है कि बीस हजार फुट की ऊंचाई पर बसे सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात जवानों की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम आज तक क्यों नहीं किया गया? बर्फीले तूफान के आने की चेतावनी का कोई सिस्टम क्यों नहीं विकसित किया गया? क्या जवानों को ऐसी कठिन परिस्थिति से निपटने के लिए अकेला छोड़ा जा सकता है? क्या सरकार को अन्य देशों द्वारा ऐसे तूफानों से निपटने के लिए अपनाए गए उपायों पर गौर नहीं करना चाहिए? क्या सीमा पर अपने सैनिकों को इस तरह शहीद होने दिया जा सकता है?
काराकोरम क्षेत्र में सियाचिन ग्लेशियर स्थित है। हजारों फुट की ऊंचाई पर स्थित यह ग्लेशियर दुनिया का सबसे ऊंचा सैन्य क्षेत्र माना जाता है। यहां जवानों को न केवल भयानक सर्दी बल्कि हिमस्खलनों से भी जूझना पड़ता है। सर्दियों में यहां का तापमान माइनस साठ डिग्री तक पहुंच जाता है। बावजूद इसके सेना के जवान यहां चौबीस घंटे मुश्तैद रहकर देश की सुरक्षा करते हैं। इन जवानों को भयानक सर्दी से बचने के लिए विशेष प्रकार की वर्दी और चश्मे दिए जाते हैं। इसके अलावा शरीर को गर्म रखने की भी व्यवस्था होती है। इन सबके बावजूद ये जवान प्रकृति के कहर से अपने आपको नहीं बचा पाते हैं। प्रकृति का ऐसा ही एक कहर यहां होने वाला हिमस्खलन है। बर्फीले तूफान के कारण हिमस्खलन की घटनाएं घटती हैं। इसकी चपेट में आने के बाद व्यक्ति का जिंदा बचना मुश्किल होता है। वर्ष 2016 में आए एक ऐसे ही हिमस्खलन में देश के दस जवान शहीद हो गए थे। बावजूद इसके अभी तक सरकार ने इससे बचाव का कोई ठोस उपाय नहीं किया है। यहां तैनात सैनिकों को बर्फीले तूफान की आहट का तब पता चलता है जब वह सिर पर आ पहुंचता है। सरकार को चाहिए कि वह यहां पर बर्फीले तूफान की पहचान के लिए एक अत्याधुनिक सिस्टम स्थापित करे। यह सिस्टम सेना के जवानों को तूफान से आगाह कर दे। यदि सेना को बर्फीले तूफान के आने की जानकारी मिल जाएगी तो वह अपने सैनिकों का आसानी से बचाव कर सकेगी। साथ ही वह सैनिकों को भी सावधान कर सकेगी। इसके अलावा बर्फीले तूफान की भयावहता से निपटने के लिए विदेशी तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। चीन और रूस से ऐसी तकनीकी ली जा सकती है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो हमारे जवान बर्फीले तूफान का शिकार होते रहेंगे।

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