राफेल सौदा, सुप्रीम कोर्ट और सियासत

सवाल यह है कि कोर्ट के इस फैसले के निहितार्थ क्या हैं? क्या बिना ठोस सबूत के याचिकाएं दायर कर दी गई थीं? क्या याचिकाकर्ता खुद ही प्राधिकारी बनने की कोशिश कर रहे थे? क्या निहित स्वार्थ की पूर्ति के लिए ये सुप्रीम कोर्ट का इस्तेमाल करना चाहते थे? क्या कानूनी दांव-पेंच के जरिए सरकार की छवि धूमिल करने की कोशिश की जा रही थी?

Sanjay Sharma

लड़ाकू राफेल विमान सौदे पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर केंद्र सरकार को क्लीन चिट दे दी है। कोर्ट ने पुनर्विचार याचिकाओं व सौदे की प्रक्रिया में गड़बड़ी की दलीलों को खारिज कर दिया। साथ ही इस मामले में किसी प्रकार की जांच को गैरजरूरी बताया। सवाल यह है कि कोर्ट के इस फैसले के निहितार्थ क्या हैं? क्या बिना ठोस सबूत के याचिकाएं दायर कर दी गई थी? क्या याचिकाकर्ता खुद ही प्राधिकारी बनने की कोशिश कर रहे थे? क्या निहित स्वार्थ की पूर्ति के लिए ये सुप्रीम कोर्ट का इस्तेमाल करना चाहते थे? क्या कानूनी दांव-पेंच के जरिए सरकार की छवि धूमिल करने की कोशिश की जा रही थी? क्या इसके जरिए चुनावी एजेंडा सेट किया जा रहा था? क्या कोर्ट के फैसले से सियासी दल सबक लेंगे?
लोक सभा चुनाव से पहले फ्रांस की कंपनी ‘दसॉ’ से हुए राफेल लड़ाकू विमान सौदे का मामला गरमाया। विपक्षी दलों साखकर कांग्रेस ने मोदी सरकार पर सीधे-सीधे भ्रष्टïाचार का आरोप लगाया और इसकी जांच की मांग की। फ्रांस और भारत सरकार की ओर से जारी बयान के बाद भी कांग्रेस सौदे में भ्रष्टïाचार का राग अलापती रही। आखिरकार यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने 14 दिसंबर 2018 को अपना फैसला सुनाया और सौदे में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी से इंकार कर दिया। बावजूद इसके कांग्रेस व अन्य सियासी दल इस मुद्दे को जोर-शोर से उछालते रहे। फैसले के खिलाफ वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण, पूर्व केंद्रीय मंत्री यशंवत सिन्हा और अरुण शौरी की ओर पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं । अब कोर्ट ने इन याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया है। कोर्ट ने दो टूक कहा कि ऐसा लगता है कि याचिकाकर्ता अनुबंध के हर पहलू को तय करने के लिए खुद को एक अपीलीय प्राधिकारी के रूप में पेश करने का प्रयास कर रहे हैं और कोर्ट को भी ऐसा करने के लिए कह रहे हैं। साफ है, अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट का भी इस्तेमाल करने की कोशिश से बाज नहीं आए और बिना किसी पुख्ता सबूत के हवा-हवाई दलीलें और इस मामले में प्रकाशित आधी-अधूरी खबरों को प्रमाण बनाकर पेश करते रहे, लेकिन विद्वान न्यायाधीशों के सामने उनकी दलीलें टिक नहीं सकी। इस फैसले से सियासी दलों को भी सबक मिलेगा। अब वे अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए कम से कम सुप्रीम कोर्ट के इस्तेमाल की कोशिश शायद नहीं करेंगे। वहीं इस फैसले से जनता के बीच इस सौदे को लेकर उत्पन्न हुआ भ्रम भी दूर होगा। सियासी दलों को समझना चाहिए कि लोकतंत्र में पारदर्शिता अनिवार्य शर्त है और जनता को भ्रमित करने का नुकसान उन्हें उठाना पड़ सकता है।

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