दुनिया का सबसे अनोखा मामला, कोर्ट के सामने खुद फरियादी रहे भगवान

  • भगवान राम के मित्र के तौर पर रिटायर्ड जज देवकी नंदन अग्रवाल ने दायर की थी याचिका

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क

लखनऊ। मंदिर-मजिस्द विवाद दुनिया का सबसे अनोखा मामला है। इस मामले में भगवान खुद कोर्ट में फरियादी बनाये गए। 1989 के आम चुनाव से पहले विश्व हिंदू परिषद के एक नेता और रिटायर्ड जज देवकी नंदन अग्रवाल ने एक जुलाई को भगवान राम के मित्र के रूप में पांचवां दावा फैजाबाद की अदालत में दायर किया था। इस दावे में स्वीकार किया गया था कि 23 दिसंबर 1949 को राम चबूतरे की मूर्तियां मस्जिद के अंदर रखी गईं। दावा किया गया था कि जन्म स्थान और भगवान राम दोनों पूज्य हैं और वही इस संपत्ति के मालिक भी हैं। इस मुकदमे में मुख्य तौर पर इस बात का उल्लेख किया गया था कि बाबर ने एक पुराना राम मंदिर तोडक़र वहां एक मस्जिद बनवाई थी। दावे के समर्थन में अनेक इतिहासकारों, सरकारी गजेटियर्स और पुरातात्विक साक्ष्यों का हवाला भी दिया गया था। इसी मुकदमे में पहली बार कहा गया था कि राम जन्म भूमि न्यास इस स्थान पर एक विशाल मंदिर बनाना चाहता है। इस दावे में राम जन्म भूमि न्यास को भी प्रतिवादी बनाया गया था। अशोक सिंघल इस न्यास के मुख्य पदाधिकारी थे।

मध्यस्थता से समाधान की कोशिशें रहीं नाकाम
लखनऊ। ( 4पीएम न्यूज़ नेटवर्क) सुप्रीम कोर्ट ने आठ मार्च को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस एफएम कलीफुल्ला की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित की थी, जिसे इस मामले के सभी पक्षों से बातचीत करके समाधान निकालना था। मध्यस्थता समिति में आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर और वरिष्ठ वकील श्रीराम पांचू भी शामिल थे। मध्यस्थता समिति ने संबंधित पक्षों से बंद कमरे में बातचीत की। ये बातचीत अयोध्या, दिल्ली और लखनऊ में हुईं। कई बार सभी संबंधित पक्षों को एक साथ इकट्ठा करके बातचीत करने की कोशिश की गई लेकिन बताया जा रहा है कि ऐसा महज एक ही बार संभव हो पाया और उसमें भी किसी सर्वमान्य हल पर एकराय नहीं बन पाई। मध्यस्थता समिति के सदस्यों ने तमाम कोशिशों के बावजूद सभी पक्षों को एक साथ लाने में सफल नहीं हुए। गौरतलब है कि इससे पहले, आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर ने अपनी ओर से भी सभी पक्षों से बातचीत की पहल की थी लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली। रविशंकर की पहल का कई लोगों ने विरोध भी किया था और उनकी पहल की कोशिशों पर सवाल भी उठाए थे। मध्यस्थता समिति के तीनों ही सदस्य दक्षिण भारत से ताल्लुक रखते हैं।

राममंदिर आंदोलन में गोरखनाथ मठ का रहा योगदान

  • महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवैद्यनाथ की रही भूमिका

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
अयोध्या। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ जिस गोरखनाथ मठ के महंत हैं, उसी से अयोध्या के राम मंदिर आंदोलन की शुरुआत हुई थी। योगी के गुरु महंत अवैद्यनाथ और अवैद्यनाथ के गुरु महंत दिग्विजय नाथ का इस आंदोलन में खास योगदान रहा है। दिग्विजय नाथ के निधन के बाद उनके शिष्य ने आंदोलन को आगे बढ़ाया। वे श्रीराम जन्म भूमि मुक्ति यज्ञ समिति के आजीवन अध्यक्ष रहे।
योगी आदित्यनाथ भी इस आंदोलन को मुखरता प्रदान करते रहे हैं। वे कहते रहे हैं कि ‘राम मंदिर चुनावी मुद्दा नहीं…मेरे लिए जीवन का मिशन है’। योगी आदित्यनाथ के गुरु गोरक्षनाथ पीठ के महंत रहे अवैद्यनाथ मंदिर आंदोलन का प्रमुख चेहरा थे। वे श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के अध्यक्ष थे। महंत अवैद्यनाथ के दिगंबर अखाड़े के महंत रामचंद्र परमहंस के साथ बेहद अच्छे संबंध थे। रामचंद्र परमहंस राम जन्मभूमि न्यास के पहले अध्यक्ष भी थे, जिसे मंदिर निर्माण के लिए गठित किया गया था। मंदिर के लिए विश्व हिंदू परिषद ने इलाहाबाद में जिस धर्म संसद (साल 1989 में) का आयोजन किया, उसमें अवैद्यनाथ के भाषण ने ही इस आंदोलन का आधार तैयार किया। धर्मसंसद के तीन साल बाद दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद का ढांचा ढहा दिया गया। योगी आदित्यनाथ भी मंदिर आंदोलन की तरह काफी मुखर रहे हैं लेकिन सीएम बनने के बाद मंदिर निर्माण को लेकर उनका नजरिया थोड़ा बदल गया। उन्होंने कहा था कि वे संवैधानिक मर्यादाओं में
रहकर जनभावनाओं का आदर करने के पक्ष में हैं।

खुदाई में मिले थे प्राचीन मंदिर के अवशेष

लखनऊ। ( 4पीएम न्यूज़ नेटवर्क)भारतीय पुरातत्विक सर्वेक्षण यानी आर्केयोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के तत्कालीन महानिदेशक बीबी लाल ने पहली बार राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद की विवादित भूमि का पुरातात्विक सर्वेक्षण किया था तब उस टीम में केके मुहम्मद भी शामिल थे। ये बात 1976 और 1977 की है जब मुहम्मद ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल करने के बाद स्कूल ऑफ आर्केयोलॉजी में पढऩा शुरू किया था यानी वे इस सर्वेक्षण में बतौर छात्र शामिल हुए थे।
कुछ सालों बाद केके मुहम्मद ने सबको तब चौंका दिया जब उन्होंने विवादित स्थल पर हुए पुरातात्विक सर्वेक्षण का खुलासा करते हुए कहा था कि वहां से प्राचीन मंदिरों के अवशेष मिले थे। उनसे पहले अपनी रिपोर्ट में बीबी लाल ने भी यही बातें कही थीं। दो-दो बार हुए पुरातात्विक सर्वेक्षणों का विश्लेषण करते हुए केके मुहम्मद कहते हैं कि विवादित स्थल पर जो लंबी दीवार और जो गुंबदनुमा ढांचे मिले हैं वह किसी इस्लामिक निर्माण के नहीं हैं क्योंकि उनमें मूर्तियां हैं जिनका इस्लामिक इबादतगाह में होने का सवाल ही नहीं उठता। इसके अलावा उन्होंने मिट्टी की बनी कई मूर्तियों और प्रणालियों का भी उल्लेख किया जिनके अवशेष बरामद हुए थे। कुछ ऐसे शिलालेख भी मिले हैं जो बिलकुल वैसे ही हैं जैसे दिल्ली में क़ुतुबमीनार के पास की मस्जिद में पाए जाते हैं। केके मुहम्मद ने उस समय यह दावा किया था। उनका कहना है कि ये शिलालेख भी 10वीं शताब्दी के हैं।

कब दर्ज हुआ पहला मामला
लखनऊ। ( 4पीएम न्यूज़ नेटवर्क) अयोध्या में विवाद की नींव करीब 400 साल पहले पड़ी थी लेकिन पहली बार अदालत की दहलीज पर यह मामला 1885 में पहुंचा था। इसके बाद से एक-एक कर हिंदू-मुस्लिम पक्षकार आते गए और कानूनी दांव-पेच में यह मामला उलझता चला गया। अदालत की दहलीज पर पहली बार अयोध्या का मामला 1885 में पहुंचा। बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद में निर्मोही अखाड़ा के महंत महंत रघुबर दास ने 1885 में फैजाबाद की जिला अदालत में पहली बार याचिका दायर की थी। उन्होंने फैजाबाद कोर्ट से बाबरी मस्जिद के पास ही राम मंदिर निर्माण की इजाजत मांगी। हालांकि अदालत ने महंत की अपील ठुकरा दी। इसके बाद से मामला गहराता गया।

कौन था मीर बाकी
लखनऊ। ( 4पीएम न्यूज़ नेटवर्क) मीर बाकी का नाम अयोध्या विवाद में बार-बार आता है, क्योंकि कहा जाता है कि इसी कमांडर ने अपने बादशाह बाबर के नाम पर यहां बाबरी मस्जिद बनवाई थी। मीर बाकी ने 1528-29 में इस मस्जिद का निर्माण किया था। माना जाता है कि मीर बाकी ने मस्जिद बनाने के लिए वहां पहले से मौजूद भगवान राम के मंदिर को तोड़ा था। मीर बाकी मुगल बादशाह बाबर का एक प्रमुख कमांडर था और मूल रूप से ताशकंद (मौजूदा समय में उज्बेकिस्तान का एक शहर) का निवासी था। बाबर ने उसे अवध प्रदेश का शासक यानी गवर्नर बनाया था। बाबरनामा में मीर बाकी को बाकी ताशकंदी के नाम से भी बुलाया गया है। इसके अलावा उसे बाकी शाघावाल, बाकी बेग और बाकी मिंगबाशी नामों से भी जाना गया लेकिन बाबरनामा में उसे मीर नाम से नहीं पुकारा गया है। अंग्रेज सर्वेयर फ्रांसिस बुकानन ने 1813-14 मेें बाकी के नाम के आगे मीर लगाया, जिसका अर्थ राजकुमार होता है। इसी मीर बाकी ने 1528 में बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया था।

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