निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी वक्फ बोर्ड और रामलला विराजमान ने नहीं माना था हाईकोर्ट का फैसला

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। अयोध्या मामले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2010 में अपना फैसला सुनाया था। हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। 30 सितंबर, 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अयोध्या के विवादित स्थल को राम जन्मभूमि करार दिया था। हाईकोर्ट ने 2.77 एकड़ जमीन का बंटवारा कर दिया था। कोर्ट ने सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्माेही अखाड़ा और रामलला के बीच जमीन बराबर बांटने का आदेश दिया था। केस से जुड़ी तीनों पार्टियां निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी वक्फ बोर्ड और रामलला विराजमान ने यह फैसला मानने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 14 अपील दायर की गई। यह मामला पिछले नौ वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में लंबित था। इस मामले की 6 अगस्त से सुप्रीम कोर्ट में रोजाना सुनवाई शुरू हुई जो 16 अक्टूबर को खत्म हुई। सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई वाली पांच जजों की बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस पीठ में न्यायमूर्ति बोबडे, न्यायमूर्ति धनंजय वाई चन्द्रचूड, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर थे। फैसले के मद्देनजर अयोध्या में धारा 144 लागू है। साथ ही सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। अयोध्या में अद्र्घसैनिक बलों के 4000 जवानों को तैनात किया गया है, ताकि कहीं भी कोई अप्रिय घटना न हो।
1528 में बाबर के कमांडर मीर बकी ने मस्जिद का निर्माण कराया था। 1885 में महंत रघुबीर दास ने फैजाबाद जिला अदालत से विवादित स्थल के बाहर की छत के निर्माण की इजाजत मांगी। 1949 को मस्जिद के गुबंद के नीचे रामलला की मूर्तियां रख दी गईं। 1950 में गोपाल सिमला विशारद ने रामलला की मूर्तियों की पूजा करने की अनुमति मांगी थी। निर्मोही अखाड़े ने याचिका दायर कर जगह पर कब्जे की इजाजत मांगी थी। 1989 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित स्थान पर यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए। 6 दिसंबर 1992 को राजनीतिक माहौल बनाकर मस्जिद के ढांचे को ढहाया गया। 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने इस्माइल फारुखी की याचिका पर कहा कि मस्जिद इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है। विवादित स्थल के मालिकाना हक को लेकर हाईकोर्ट में सुनवाई की शुरुआत हुई। आठ साल बाद 2010 को हाईकोर्ट ने दो और एक के अनुपात से जमीन को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़े और रामलला में बंटवारा कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मसले पर हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाई। भाजपा नेता और वकील सुब्रमण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर निर्माण पर याचिका दायर की। पूर्व चीफ जस्टिस जेएस केहर ने केस को अदालत के बाहर सुलझाने की सलाह दी। 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए 3 जजों की बेंच बनाई। वहीं शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट से मस्जिद को विवादित स्थल से दूर बनाने के लिए कहा। 1 दिसंबर 2017 में 32 समाजसेवियों ने फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की। फरवरी 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने नागरिक याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की। कोर्ट ने सुब्रमण्यम स्वामी की सभी अंतरिम याचिकाओं को खारिज किया।

अयोध्या विवाद ने नेहरू को कर दिया था विचलित

1949 में शुरू हुए अयोध्या विवाद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को विचलित कर दिया था। उन्हें लगने लगा था कि कांग्रेस के ही कुछ शीर्ष नेता सांप्रदायिक भाषा में बातें करने लगे हैं। ये स्थिति उनके लिए नागवार थी। नेहरू ने यूपी की घटनाओं पर अगर खुद शर्मिंदा पाया तो संयुक्त प्रांत के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने भी उन्हें पत्र लिखकर कहा कि वो शर्मिंदा हैं। उस समय यूपी के गृह मंत्री लालबहादुर शास्त्री थे, उन्होंने भी तत्कालीन घटनाओं पर खेद जाहिर किया। अयोध्या मामले में कई पत्र लिखने के बाद प्रधानमंत्री नेहरू ने 17 अप्रैल 1950 को फिर गोविंद बल्लभ पंत को पत्र लिखा-‘‘शाहजहांपुर के बारे में आपके पत्र के लिए शुक्रिया। मुझे पूरा भरोसा है कि उत्तर प्रदेश में हाल ही में पेश आई दिक्कतों के बारे में आपकी सरकार ने सख्त और कारगर कदम उठाए होंगे। मुझे यह जानकर खुशी है कि आप की कार्रवाई और आपने जो समझौता किया, उसके फलस्वरूप हालात अब स्थिरता की ओर बढ़ रहे हैं। यूपी में हाल ही में हुई घटनाओं ने मुझे बुरी तरह दुखी किया है। या यों कहें कि लंबे समय से मैं जो महसूस कर रहा हूं, यह उसका मिलाजुला असर है। लोगों की मौत और हत्याओं की खबर बहुत दुखदायी होती है, लेकिन इससे मैं उतना परेशान नहीं होता। जो चीज मेरे दिल को कचोटती है, वह है मानव मूल्यों का पूरी तरह पतन। हद तो तब हो जाती है, जब इस तरह की हरकतों को वाजिब ठहराया जाता है।
यह भी लिखा कि मैं लंबे समय से महसूस कर रहा हूं कि सांप्रदायिकता के लिहाज से यूपी का माहौल बुरी तरह बिगड़ता जा रहा है। बल्कि यूपी मेरे लिए एक अजनबी जमीन होती जा रही है। मैं खुद को उसमें फिट नहीं पाता। यूपी कांग्रेस कमेटी, जिसके साथ में 35 साल तक जुड़ा रहा, अब इस तरह काम कर रही है, जिसे देखकर मैं आश्चर्य में पड़ जाता हूं। इसकी आवाज उस कांग्रेस की आवाज नहीं है, जिसे मैं जानता हूं, बल्कि यह आवाज उस तरह की है जिसका मैं पूरी जिंदगी विरोध करता रहा हूं। पुरुषोत्तम दास टंडन, जिनसे मुझे दिली मोहब्बत है और जिनका मैं सम्मान करता हूं, वह लगातार भाषण दे रहे हैं। वह भाषण मुझे कांग्रेस के बुनियादी उसूलों के खिलाफ नजर आते हैं। विशंभर दयाल त्रिपाठी जैसे दूसरे कांग्रेस मेंबर इस तरह के आपत्तिजनक भाषण दे रहे हैं, जैसे भाषण हिंदू महासभा के लोग देते हैं।’’ गौरतलब है कि नेहरू के लाख विरोध के बावजूद पुरुषोत्तमदास टंडन कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे। उन्हें सरदार पटेल का समर्थन हासिल था। पटेल के निधन के बाद नेहरू टंडन का इस्तीफा कराने में कामयाब हो पाए थे।

सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर

1994 के फैसले पर पुनर्विचार के लिए राजीव धवन ने सुप्रीम कोर्ट ने याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने आखिरी फैसले के लिए 5 जजों की बेंच को केस ट्रांसफर करने की मांग ठुकराई। 29 अक्टूबर 2018 से रोजाना सुनवाई की बात कही गई। 29 अक्टूबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या पर सुनवाई 2019 जनवरी तक टली। जनवरी 2019 में जस्टिस यूयू ललित ने खुद को सुनवाई से अलग किया। रोजाना सुनवाई की तारीख 29 जनवरी 2019 तक टली। वहीं 25 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने पांच सदस्यों की नई बेंच गठित की गई। इसमें जस्टिस गोगोई, जस्टिस बोबड़े, जस्टिस चंद्रचूड, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस नजीर शामिल। 6 अगस्त 19 से सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की रोजाना सुनवाई शुरू और अक्टूबर में सुनवाई खत्म हो गई। देश को कोर्ट के फैसले का इंतजार था।

अयोध्या मामले में विशेष भूमिका वाले 10 नाम

लखनऊ। अयोध्या पर पूरी दुनिया की नजरें लगी हुई हैं, फैसला न सिर्फ दक्षिण एशिया बल्कि वैश्विक स्तर पर भी असर डालेगा। अयोध्या के पूरे मामले पर नजर डालें तो इसमें कई किरदार शामिल हैं लेकिन इसके इतिहास पर नजर डालें तो 10 नाम ऐसे हैं जिनकी इस पूरे मामले में विशेष भूमिका रही है। इममें देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर मुलायम सिंह यादव और लाल कृष्ण आडवाणी का नाम शामिल है। हम आपको ऐसे ही 10 नाम और अयोध्या मामले में उनकी भूमिका बता रहे हैं।

1- पंडित जवाहर लाल नेहरू: मस्जिद में 23 दिसंबर 1949 को भगवान राम की मूर्तियां मिलने से तनाव फैल गया। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उस वक्त के मुख्यमंत्री जीबी पंत से मामले को सख्ती से देखने के लिए कहा। सरकार को मूर्तियों को हटाने का आदेश दिया गया लेकिन अयोध्या के उस वक्त के जिलाधिकारी ने आदेश का पालन करने से मना कर दिया। जिलाधिकारी को अंदेशा था कि ऐसा करने से दंगा भडक़ सकता है। प्रधानमंत्री नेहरू अयोध्या का दौरा करना चाहते थे लेकिन डीएम ने सुरक्षा कारणों के चलते उन्हें अनुमति नहीं दी।
2. रामचंद्र परमहंस: रामचंद्र परमहंस वही शख्स हैं जो अयोध्या मामले को कोर्ट की दहलीज पर लेकर गए। 5 दिसंबर 1950 को रामचंद्र परमहंस ने विवादित स्थल पर पूजा करने के लिए जिला अदालत में मुकदमा किया। बाद में परमहंस रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष भी बने। रामचंद्र परमहंस मामले को कोर्ट में ले जाने से काफी पहले ही आंदोलन से जुड़ गए थे। परमहंस का महत्व इस बात से ही समझा जा सकता है कि 31 जुलाई 2003 को अयोध्या में जब इनका निधन हुआ तो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी उनके अंतिम संस्कार में पहुंचे थे।
3- हाशिम अंसारी: हाशिम अंसारी अयोध्या मामले के पहले गवाह हैं, जनवरी 1949 में जब मूर्तियां रखे जाने की घटना अयोध्या कोतवाली में दर्ज करवाई गई तब सबसे पहले गवाह हाशिम अंसारी ही सामने आए थे। अंसारी और हाजी फेंगकू समेत 9 मुसलमानों ने मालिकाना हक के लिए दिसंबर 1961 में दूसरा केस फैजाबाद के सिविल कोर्ट में दायर किया। 20 जुलाई 2016 को हाशिम अंसारी का निधन हो गया, उनके निधन के बाद से इस मामले में उनके बेटे इकबाल अंसारी मुख्य पक्षकार हैं।
4. अशोक सिंघल: विश्व हिंदू परिषद ने अप्रैल 1984 में अयोध्या में धर्म संसद का आयोजन किया, इसके मुख्य अगुआ अशोक सिंघल रहे। इस धर्म संसद से ही अयोध्या में राम मंदिर के लिए आंदोलन की नींव पड़ी। अशोक सिंघल का नाम 6 दिसंबर 1992 के बाबरी विध्वंस मामले में भी मुख्य रूप से लिया जाता है। इस मामले में सीबीआई ने जो आरोपपत्र दायर किया उसमें लिखा कि अशोक सिंघल मंच से कारसेवकों को भडक़ा रहे थे। अशोक सिंघल का निधन 17 नवंबर 2015 को हुआ।
5. राजीव गांधी: अयोध्या मामले में राजीव गांधी का नाम ऐसा है जिसे लेकर अक्सर कई तरह के सवाल उठते रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने साल 1985 में विवादित बाबरी मस्जिद परिसर का ताला खोलने के आदेश दिए। शाहबानो केस पर फैसले के बाद राजीव गांधी अपनी छवि को लेकर बेहद चिंतित थे। वह नहीं चाहते थे कि समाज में संदेश जाए कि वे हिंदू विरोधी हैं। बोफोर्स घोटाला भी सरकार की मुश्किलें बढ़ा रहा था। चुनावी साल को देखते हुए राजीव गांधी ने ताला खोलने का आदेश दिया।
6. मुलायम सिंह यादव: समाजवादी पार्टी के मुखिया रहे मुलायम सिंह यादव का भी अयोध्या मामले में बेहद अहम किरदार है। दरअसल, साल 1990 में राम जन्मभूमि आंदोलन तेज हुआ। अयोध्या में सुरक्षा की दृष्टि से कफ्र्यू लगाया गया था। 30 अक्टूबर 1990 को कारसेवकों पर गोली चली, इसमें पांच लोग मारे गए। इस गोलीबारी से कारसेवक बेहद नाराज थे। नाराज कारसेवक 2 नवंबर 1990 को हनुमान गढ़ी के पास पहुंच गए। यहां पुलिस ने कारसेवकों पर गोली चलाई।
7. लाल कृष्ण आडवाणी: रामजन्मभूमि आंदोलन में पूर्व उप प्रधानमंत्री और दिग्गज बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी का नाम व किरदार भी बेहद अहम है। उनकी चर्चा के बिना इस कहानी को कहा ही नहीं जा सकता। साल 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ मंदिर से अयोध्या के लिए रथयात्रा की शुरुआत की। इसी रथयात्रा का असर 6 दिसंबर 1992 को भी नजर आया। अशोक सिंघल के साथ ही लाल कृष्ण आडवाणी को भी केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई ने मुख्य सूत्रधार माना।
8. कल्याण सिंह: 6 दिसंबर, 1992 को जब अयोध्या में विवादित ढांचा गिराने की घटना हुई उस वक्त प्रदेश की कमान कल्याण सिंह के हाथों में ही थी। सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में कुल 13 आरोपियों को शामिल किया, जिसमें कल्याण सिंह भी थे। कल्याण सिंह पर आरोप लगा कि उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए अन्य नेताओं के साथ अयोध्या पहुंचकर राम मंदिर बनाने की शपथ ली। विवादित ढांचा गिरने के साथ ही कल्याण सिंह ने इस्तीफा दे दिया, सात दिसंबर 1992 को प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने सरकार को बर्खास्त कर दिया। सरकार गिरने के बाद कल्याण सिंह ने कहा कि बाबरी का विध्वंस भगवान की मर्जी थी। मुझे इसका कोई मलाल नहीं है।
9. नरसिम्हा राव: अयोध्या विवाद में पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की भी अहम भूमिका है। दरअसल 6 दिसंबर, 1992 को जब बाबरी का ढांचा गिराया गया तब नरसिम्हा राव ही देश के प्रधानमंत्री थे। जिस वक्त अयोध्या में ये घटना हो रही थी राव अपने निवास पर पूजा में बैठे थे। तत्कालीन केंद्रीय गृह सचिव रहे माधव गोडबोले ने हाल ही में कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने इस घटना से पहले गृह मंत्रालय द्वारा तैयार योजना खारिज नहीं की होती, तो मस्जिद को ढहने से बचाया जा सकता था।
10. महंत नृत्य गोपाल दास: महंत नृत्य गोपाल दास को रामचंद्र दास परमहंस के निधन के बाद रामजन्मभूमि न्यास की कमान सौंपी गई। नृत्य गोपाल दास को राम मंदिर की सबसे बुलंद आवाज में गिना जाता है। उनकी गिनती मंदिर आन्दोलन के प्रमुख संतों में होती है। फैसले से पहले महंत नृत्य गोपाल दास ने कहा कि अयोध्या से पूरी दुनिया में प्रेम और सौहार्द का संदेश जाना चाहिए।

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