4PM! खबरची, कुछ मीठी मिर्ची

देखो, मैं मंदिर हो आई

सत्ता की चाहत जो न करा दे थोड़ा है। एक मैडम पूरे तामझाम के साथ मैदान में कूदी थीं कि उनका नाम ही काफी है सत्ता पाने के लिए, लेकिन जैसे ही धरालत पर आईं समझ आ गया कि दाल शायद ही गले। परिवारवालों के कारनामों ने उनकी हालत खराब कर दी है। सो कुर्सी के चक्कर में मंदिर-मंदिर वाला दांव चला है। पिछली बार इसी दांव से उनके भाई साहब ने तीन राज्यों में कुर्सी हथिया ली थी। लिहाजा मैडम पूरे लाव-लश्कर के साथ मंदिर-मंदिर जा रही है। गंगा से लेकर क्षिप्रा नदी के किनारे तक के सभी मंदिरों में मत्था टेक चुकी हैं। पता नहीं भगवान भला कर दें। कम से कम कुछ लोग तो उन्हें अपनी जमात में शामिल कर ही लेंगे।

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