चिकित्सकीय प्रतिष्ठानों से लाइसेंस शुल्क वसूलने में नगर निगम सुस्त, करोड़ों की लग रही चपत

  • वसूली का आदेश देकर पल्ला झाड़ रहे जिम्मेदार
  • राजधानी में है करीब दस हजार से अधिक प्रतिष्ठïान
  • आर्थिक संकट झेलने के बावजूद नहीं चेत रहा विभाग

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। नगर निगम में आर्थिक स्थिति बेहद खराब है। विकास कार्यों से लेकर कर्मचारियों को देयक चुकाने का भी पैसा नहीं है। कर्मचारियों का वेतन भी बमुश्किल मिल पाता है। कार्यदायी संस्था के कर्मचारियों को भी समय से वेतन नहीं मिलता। इसका कारण यह है कि नगर निगम पर देनदारी ज्यादा है और अमादनी कम है। नगर निगम केवल हाउस टैक्स वसूली पर निर्भर है। प्रचार विभाग से होने वाली आमदनी भी जीएसटी के कारण खत्म हो गई है। बावजूद विभाग की ओर से चिकित्सकीय प्रतिष्ठïानों से लाइसेंस शुल्क वसूली नहीं की जा रही है। अफसरों की इस लापरवाही से निगम को करोड़ों का चूना लग रहा है। वहीं निगम के जिम्मेदार वसूली का निर्देश देकर अपना पल्ला झाड़ रहे हैं।
निगम के स्वास्थ्य विभाग द्वारा चिकित्सकीय प्रतिष्ठानों से शुल्क वसूली नहीं की जा रही है। तीन साल पहले शासन के आदेश पर नगर निगम को 14 वर्ष बाद शहर के विभिन्न चिकित्सकीय प्रतिष्ठानों से लाइसेंस शुल्क वसूलने की मंजूरी मिली थी, लेकिन निगम के अधिकारी इस तरह की राजस्व वसूली को लेकर बेपरवाह हैं। यही कारण है कि चिकित्सकीय प्रतिष्ठानों को नगर निगम की ओर से निर्गत किए जाने वाले लाइसेंस की संख्या हर वित्तीय वर्ष में सैकड़ें तक भी नहीं पहुंचती है। नगर स्वास्थ्य अधिकारी कई बार सभी जोनल अफसरों को लिखित रूप से लाइसेंस वसूली के निर्देश दे चुके हैं लेकिन संबंधित अफसर कुंभकर्णी नींद में है। अधिकारियों की यह लापरवाही विभाग पर भारी पड़ रही है। हालांकि मौजूदा समय में अफसर स्वच्छ सर्वेक्षण में व्यस्तता की बात कह रहे हंै लेकिन इतने सालों में इस वसूली पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। नतीजतन निगम को करोड़ों के राजस्व का घाटा हो रहा है। वर्ष 2015 के शासनादेश के क्रम में नगर निगम क्षेत्र में संचालित लगभग 10 हजार से अधिक चिकित्सकीय प्रतिष्ठानों से लाइसेंस शुल्क वसूलने के लिए कई बार अफसरों ने सभी संबंधित अधिकारियों को पत्र भेज कर लाइसेंस शुल्क वसूलने के निर्देश दिये। बावजूद इसके लाइसेंस शुल्क वसूली नहीं शुरू की गई। न ही शुल्क वसूली के लिए कोई टीम ही गठित की गयी। हालांकि विभाग ने प्रचार माध्यमों के जरिए चिकित्सकीय प्रतिष्ठानों से लाइसेंस शुल्क वसूले जाने की जानकारी जरूर दी थी, लेकिन विभाग के इस तरीके से कोई हल नहीं निकला। हैरानी की बात यह है कि इस मामले को लेकर उच्च अधिकारियों ने यह जानने तक की कोशिश भी नहीं की कि शुल्क लेने के बाद प्रतिष्ठानों को लाइसेंस जारी किया जा रहा है या नहीं। स्थितियां सुधरती नहीं दिख रही हैं।

तीन साल पहले जारी किए गए थे निर्देश

लाइसेंस शुल्क वसूली के लिए शासन से तीन साल पहले निर्देश प्राप्त हो चुके हैं लेकिन इन तीन सालों में विभाग ने लाइसेंस शुल्क न जमा करने वाले चिकित्सकीय प्रतिष्ठानों पर कोई कार्रवाई नहीं की है। न ही लाइसेंस शुल्क वसूली के लिए कोई खास कदम उठाए। लाइसेंस जारी करने वाले नगर निगम के एक बाबू ने बताया कि हम लाइसेंस शुल्क वसूली के लिए किसी भी चिकित्सकीय प्रतिष्ठान पर नहीं जाते हैं। कभी-कभी अगर कोई आ जाता हैं तो उसका लाइसेंस बना दिया जाता है। गौरतलब है कि राजधानी में दस हजार से अधिक चिकित्सकीय प्रतिष्ठान संचालित हैं, जिनसें लाइसेंस शुल्क न लिए जाने से निगम को करोड़ों की हानि उठानी पड़ रही है।

लाइसेंस शुल्क की दरें (रुपयों में )
50 बेड वाले निजी नर्सिंग होम: 5000
50 बेड वाले ऊपर वाले निजी नार्सिंग होम : 10,000
पैथालॉजी : 5000
केवल पैथालॉजी : 2000
ब्लड बैंक : 5000
डेंटल क्लीनिक : 5000
आयुर्वेदिक/यूनानी/होम्योपैथिक क्लीनिक : 2500
इनसे लाइसेंस शुल्क वसूली का नियम
नर्सिंग होम, प्रसूति गृह, प्राइवेट अस्पताल, पैथालॉजी सेन्टर, डाइग्नोस्टिक सेन्टर, ब्लड बैंक, एक्सरे क्लीनिक, डेन्टल क्लीनिक और प्राइवेट क्लीनिक।

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