जिद… सच की अग्निकांडों से कब सबक सीखेगी सरकार

सवाल यह है कि फैक्ट्री को रिहायशी इलाके में संचालित करने की इजाजत किसने दी? क्या फायर समेत तमाम विभाग इसके लिए जिम्मेदार नहीं है? क्या आग से बचाव के उपकरणों के बिना फैक्ट्री को संचालित करने की अनुमति दी गई थी? क्या यह खेल अफसरों और संचालकों की मिलीभगत से चल रहा है? क्या लोगों के जान-माल की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की नहीं है?

Sanjay Sharma

राजधानी के पलटन छावनी स्थित ब्रेड फैक्ट्री में डीजल टैंक फटने से भीषण आग लग गई। हादसे के वक्त फैक्ट्री में काफी संख्या में मजदूर काम कर रहे थे। घंटों की मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया जा सका। फैक्ट्री के पास एक प्राथमिक स्कूल में सौ से अधिक बच्चे पढ़़ रहे थे। उन्हें किसी तरह बाहर निकाला गया। धुएं के कारण कॉलोनी के लोगों का दम घुटने लगा। रिहायशी इलाके में संचालित इस फैक्ट्री में आग से बचाव का कोई उपकरण तक नहीं था। सवाल यह है कि फैक्ट्री को रिहायशी इलाके में संचालित करने की इजाजत किसने दी? क्या फायर समेत तमाम विभाग इसके लिए जिम्मेदार नहीं है? क्या आग से बचाव के उपकरणों के बिना फैक्ट्री को संचालित करने की अनुमति दी गई थी? क्या यह खेल अफसरों और संचालकों की मिलीभगत से चल रहा है? क्या लोगों के जान-माल की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की नहीं है? आखिर राजधानी में हो चुके कई अग्निकांडों के बावजूद सरकार इससे सबक क्यों नहीं सीख रही है?
राजधानी के रिहायशी इलाके आग के मुहाने पर हैं। यहां कानून को ठेंगा दिखाकर धड़ल्ले से फैक्ट्रियां संचालित की जा रही हैं। राजाजीपुरम, उतरेटिया, सरोजनीनगर और चिनहट समेत तमाम इलाकों में फैक्ट्रिया संचालित की जा रही हैं। इन फैक्ट्रियों में आग से बचाव के कोई उपकरण नहीं है। जरा सी लापरवाही हजारों लोगों की जान जोखिम में डाल सकती है। पिछले दिनों हुसैनाबाद में अवैध वेल्डिंग कारखाने में अमोनिया गैस के रिसाव से दर्जनों लोग बीमार हो गए थे। इसी तरह सितंबर में गुडंबा की आइसक्रीम फैक्ट्री में आग लग गई थी। हाल में घटी ये घटनाएं बानगी भर है। हैरानी की बात यह है कि रिहायशी इलाकों में हो रही इन घटनाओं के बावजूद पुलिस प्रशासन लापरवाही भरा रवैया अपना रहा है। फायर और पुलिस महकमा भी इन फैक्ट्रियों की जांच पड़ताल की जहमत नहीं उठाता है। हकीकत यह है कि अफसरों और संचालकों की साठ-गांठ से रिहायशी इलाकों में फैक्ट्रियों का संचालन किया जा रहा है। नियमत: आग से बचाव के उपकरणों के बिना किसी भी फैक्ट्री या कारखाने को संचालित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। सरकारी व निजी अस्पतालों और इमारतों का भी यही हाल है। यहां आग से सुरक्षा के मानकों को पूरा नहीं किया जा रहा है। यदि सरकार लोगों के जान-माल की सुरक्षा चाहती है तो उसे न केवल संबंधित विभागों में व्याप्त भ्रष्टïाचार पर शिकंजा कसना होगा बल्कि नियमों का कठोरता से पालन कराना भी सुनिश्चित करना होगा। यदि ऐसा नहीं किया गया तो राजधानी में कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।

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