श्रीलंका में राजनीतिक अस्थिरता

प्रो. सतीश कुमार

श्रीलंका राजनीतिक संकट से जूझ रहा है। श्रीलंका की राजनीति में आंतरिक राजनीतिक कलह कम और बाहरी प्रभाव ज्यादा सक्रिय है। इसमें द्वंद्व भारत और चीन के बीच प्रभाव को लेकर है। श्रीलंका में 2015 से नये प्रधानमंत्री द्वारा कुछ ऐसे कदम उठाये गये हैं, जिससे चीन की निष्कंटक विस्तार नीति पर अंकुश लगा था। चीन इससे बेचैन था। राष्ट्रपति सिरिसेना और प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे के बीच 2015 में राजनीतिक सूत्र बने थे, जो भारत के अनुकूल था।
चीन को लगने लगा कि यह गठबंधन उसके भावी योजनाओं पर भी प्रश्न उठायेगा। इसलिए इस गठबंधन की राजनीति को तोडऩा जरूरी है। इस पहल में चीन के पसंदीदा नेता पूर्व राष्ट्रपति राजपक्षे थे। उनके जरिये चीन ने श्रीलंका के लोकतंत्र को खतरे में डाल दिया। पिछले कुछ महीनों से जो हो रहा है, वह आंतरिक नीतियों की वजह से कम और बाहरी प्रभाव से ज्यादा हो रहा है। अब चुनौती भारत के सामने है कि श्रीलंका की बेतरतीब व्यवस्था को वह अपने पक्ष में कैसे मोड़े। भारत के लिए श्रीलंका एक ऐसा सेतु है, जहां पर विदेशी ताकतों का ध्रुवीकरण खुद श्रीलंका के लिए भी असुरक्षा का कारण बन सकता है।
श्रीलंका मूलत: चीन के जाल में पूरी तरह फंस चुका है। राजपक्षे और सिरिसेना के बीच में नाटकीय संधि मिलन भी चीन की चाल बताता है। साल 2016 में नेपाल में भी दो विरोधी साम्यवादी गुटों को एक करने में चीन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। जब प्रचंड और ओली आपस में मिलकर चुनाव लड़े और सत्ता पर काबिज हुए थे। उसके बाद से चीन की पहुंच नेपाल में और तेज हो गयी थी। ठीक वही फॉर्मूला श्रीलंका में भी चीन चला रहा है। चीन की कंपनी ने श्रीलंका में 1.5 अरब डॉलर के खर्च से एक नये कमर्शियल डिस्ट्रिक्ट का निर्माण किया है।
हम्बनटोटा बंदरगाह चीन की गिरफ्त में है। चीन इसका उपयोग कामर्शियल चीजों के लिए करना चाहता है, लेकिन जैसे-जैसे चीन का कर्ज जाल श्रीलंका को फांसता जा रहा है, उसमें इस बंदरगाह का प्रयोग सैनिक रूप में होना तय है। भारत के लिए यहीं से समस्या शुरू होती है। श्रीलंका के सामरिक महत्व से भारत परिचित है कि अगर सैन्य-रूप से हम्बनटोटा का प्रयोग होगा, तो भारत की सुरक्षा चीन के निशाने पर होगी।
साल 1978 में संवैधानिक परिवर्तन द्वारा श्रीलंका में राष्ट्रपति शासन व्यवस्था की नींव रखी गयी। इसके पहले प्रधानमंत्री ही शासन का प्रमुख होता था। साल 1978 के बाद राष्ट्रपति ही देश और सरकार दोनों का प्रमुख बन गया। वह तीनों सेनाओं का प्रमुख है। श्रीलंका में जनता राष्ट्रपति को चुनती है। उसका कार्यकाल पांच वर्ष होता है और वह दो बार चुना जा सकता है। प्रधानमंत्री की राजनीतिक हैसियत राष्ट्रपति के सहयोगी के रूप में होती है। किसी कारणवश राष्ट्रपति हटता है, तो नये राष्ट्रपति की नियुक्ति तक प्रधानमंत्री ही राष्ट्रपति की भूमिका में होता है।
राजपक्षे श्रीलंका के सबसे पसंदीदा राजनेता हैं। साल 2005 से 2014 तक वह राष्ट्रपति रहे। विगत तीस वर्षों से श्रीलंका के गृह युद्ध को खत्म करने का काम भी राजपक्षे ने ही किया। लेकिन, उनके कार्यकाल में नरसंहार भी जमकर हुआ। राजपक्षे की शासन व्यवस्था पर अधिनायकवादी त्रासदी का आरोप था। देश की संस्थाओं को तोड़ा-मरोड़ा गया। साथ ही यहां भाई-भतीजावाद की शुरुआत हुई। बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार को पनपने के मौके मिले। चीन की विभिन्न परियोजनाओं में राजपक्षे सरकार ने खूब कमाया। राजपक्षे के कार्यकाल में सिरिसेना एक मंत्री होते थे। उनका मुख्य राजनीतिक उद्देश्य राजपक्षे द्वारा किये गये नरसंहार में संलिप्त दोषियों की शिनाख्त करना और उन्हें सजा दिलवाना था। जबकि दूसरा आयाम चीनी हस्तक्षेप पर शिकंजा कसना था।
एक दिन अचानक संसद में राष्ट्रपति द्वारा घोषणा कर दी गयी कि देश के नये प्रधानमंत्री राजपक्षे होंगे। बिना संसद में बहुमत सिद्ध करने का मौका दिये विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री पद से नाटकीय ढंग से हटा दिया गया। इसी बीच श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना को तगड़ा झटका देते हुए संसद भंग करने का फैसला पलट दिया। कोर्ट ने 5 जनवरी को होने वाले मध्यावधि चुनाव की तैयारियों पर भी रोक लगा दी है। फिलहाल बहुमत साबित करने की स्थितियां बनती नजर आ रही हैं। यहां विक्रमसिंघे के पास 106 सांसद हैं, राजपक्षे के साथ 95। बहुमत के लिए 113 सांसद चाहिए। प्रधानमंत्री चाहे राजपक्षे बनें या विक्रमसिंघे, यह तय है कि श्रीलंका की राजनीति कुत्सित हो गयी है। संवैधानिक संस्थाएं पंगु हो चुकी हैं और लोकतंत्र संकट में है।
फिलहाल दक्षिण एशिया के देशों के राजनीतिक ढांचे को तोडऩे का काम चीन कर रहा है।। चीन की चाल का अहम आयाम लोकतंत्र को ‘बनाना रिपब्लिक’ बना देना है, जहां सब कुछ पैसे के दम पर किया जा सके। वह पाकिस्तान और नेपाल में अपनी चाल सफल होने के बाद श्रीलंका में प्रयोग सफल करने की कोशिश में जुटा है। मालदीव पहले से खतरे में है। इसलिए भारत सरकार को चीन के जाल की काट खोजनी होगी।

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