जिद… सच की- महिला अपराधों का बढ़ता ग्राफ और पुलिस तंत्र

सवाल यह है कि महिला अपराधों पर नियंत्रण क्यों नहीं लग पा रहा है? क्या पुलिस तंत्र ऐसी जघन्य घटनाओं को रोकने में नाकाम साबित हो रहा है? क्या पुलिस तंत्र में व्याप्त भ्रष्टïाचार के कारण अपराधियों के हौसले बुलंद हैं? क्या कड़े कानूनों के बावजूद महिला अपराधों पर लगाम लगाना मुश्किल हो गया है?

Sanjay Sharma

लखनऊ के चिनहट इलाके में दो युवतियों के शव इंदिरा नहर में उतराते मिले। इस मामले में हत्या की आशंका जताई गई है। पुलिस इन शवों की गुत्थी सुलझाने में जुटी है। यह घटना यह बताने के लिए काफी है कि तमाम दावों के बावजूद प्रदेश में महिला अपराधों का ग्राफ बढ़ रहा है। आए दिन महिलाओं की हत्या, अपहरण, बलात्कार, दहेज उत्पीडऩ और छेड़छाड़ की घटनाएं घट रही हैं। सवाल यह है कि महिला अपराधों पर नियंत्रण क्यों नहीं लग पा रहा है? क्या पुलिस तंत्र ऐसी जघन्य घटनाओं को रोकने में नाकाम साबित हो रहा है? क्या पुलिस तंत्र में व्याप्त भ्रष्टïाचार के कारण अपराधियों के हौसले बुलंद हैं? क्या कड़े कानूनों के बावजूद महिला अपराधों पर लगाम लगाना मुश्किल हो गया है? क्या अपराधियों और पुलिस की मिलीभगत के कारण वारदातें बढ़ रही है? क्या महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व नहीं? क्या केवल कुंठित और सामंती मानसिकता महिला अपराधों के लिए जिम्मेदार है?
प्रदेश में महिलाएं असुरक्षित हैं। विभिन्न थानों में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की रोजाना सौ से अधिक एफआईआर दर्ज हो रही है। ये एफआईआर रेप और रेप के प्रयास, दहेज हत्या, अपहरण, शारीरिक शोषण, अश्लीलता, घरेलू हिंसा जैसी धाराओं में दर्ज की गई हैं। छेड़छाड़ की घटनाएं एक साल में दोगुनी हो गई हैं। वर्ष 2016-17 में जहां ऐसी 495 घटनाएं हुईं थी वहीं अप्रैल 2017 से जनवरी 2018 के बीच ऐसी 987 घटनाएं घटी हैं। इस अवधि में अपहरण की वारदातें 9828 से बढक़र 13226 हो गई हैं। बलात्कार की घटनाएं 2943 से बढक़र 3704 पर पहुंच गई हैं। दहेज के लिए महिलाओं को प्रताडि़त करने का आंकड़ा 2084 से बढक़र 2223 पर पहुंच गया है। महिलाओं की हत्या के मामले भी तेजी से बढ़े हैं। हकीकत यह है कि महिला अपराधों के पीछे कुंठित व सामंती मानसिकता के अलावा पुलिस की लापरवाही भी कम जिम्मेदार नहीं है। कई बार बलात्कार और छेड़छाड़ की घटनाओं की एफआईआर तक नहीं लिखी जाती है। पुलिसकर्मी पीडि़ता पर आरोपी से समझौता करने का दबाव तक बनाते हैं। दहेज उत्पीडऩ में कई बार ले-देकर मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है। खुद कई पुलिसकर्मी अपराधियों के साथ मिलकर अपराधों को अंजाम देते हैं। चौराहों पर पुलिस की तैनाती के बावजूद महिलाओं से छेड़छाड़ और चेन स्नेचिंग की घटनाएं थम नहीं रही हैं। यदि सरकार महिला अपराधों पर लगाम लगाना चाहती है तो उसे न केवल समाज में व्याप्त कुंठित व सामंती मानसिकता को दूर करने के लिए जागरूकता अभियान चलाना होगा बल्कि पुलिस विभाग में व्याप्त भ्रष्टïाचार को भी समाप्त करना होगा।

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