पेयजल संकट और भविष्य की चिंता

सवाल यह है कि पर्याप्त मानसूनी बारिश, तमाम नदियों और अन्य प्राकृतिक जलस्रोतों के बावजूद देश में पेयजल संकट की स्थिति क्यों उत्पन्न हुई? क्या जल के कुप्रबंधन ने देश को जल संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया है? क्या लचर सरकारी तंत्र इसके लिए जिम्मेदार नहीं है? क्या भावी पीढ़ी बूंद-बूंद पानी को तरस जाएगी? क्या इस संकट से निपटने का कोई रास्ता है?

देश गंभीर पेयजल संकट के मुहाने पर खड़ा है। करीब तीन चौथाई लोगों को शुद्ध पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। हर साल दो लाख लोग दूषित पेयजल के कारण मौत के मुंह में समा जाते हैं। नीति आयोग की यह रिपोर्ट भविष्य के लिए खतरे की घंटी है। सवाल यह है कि पर्याप्त मानसूनी बारिश, तमाम नदियों और अन्य प्राकृतिक जलस्रोतों के बावजूद देश में पेयजल संकट की स्थिति क्यों उत्पन्न हुई? क्या जल के कुप्रबंधन ने देश को जल संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया है? क्या लचर सरकारी तंत्र इसके लिए जिम्मेदार नहीं है? क्या भावी पीढ़ी बूंद-बूंद पानी को तरस जाएगी? क्या इस संकट से निपटने का कोई रास्ता है? क्या जनता की भागीदारी के बिना इस समस्या से निपटा जा सकता है?
पेयजल संकट को लेकर नीति आयोग की रिपोर्ट बेहद चिंतित करती है। जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत दुनिया के 122 देशों की सूची में 120वें पायदान पर है। 60 करोड़ लोग पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। देश के 84 फीसदी ग्रामीण घरों में पाइप से पानी की आपूर्ति नहीं की जाती है और देश में उपलब्ध 70 फीसदी पानी प्रदूषित हो चुका है। हकीकत यह है कि देश में जल संकट एक दिन में नहीं आया है। विकास की दौड़ में प्रकृति के इस अमूल्य उपहार को दरकिनार कर दिया गया। भयानक तरीके से हुए भूगर्भ जल दोहन ने स्थितियों को और बिगाड़ दिया। भूगर्भ जल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है। इसका सीधा असर पानी की गुणवत्ता पर पड़ रहा है। रही सही कसर प्राकृतिक जल स्रोतों को प्रदूषित करके पूरा कर दिया गया। कई नदियां नालों में तब्दील हो गईं जबकि कई विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी हैं। कुओं और तालाबों को पाट दिया गया है। इस मामले में उत्तर प्रदेश की स्थिति बदतर है। 24 राज्यों के जारी रैकिंग में यह नीचे से तीसरे पायदान पर है। इन हालातों पर जल्द काबू नहीं पाया गया तो 2050 तक देश के सकल घरेलू उत्पाद को छह फीसदी का नुकसान होगा। यदि सरकार स्थितियों में सुधार लाना चाहती है तो उसे प्राकृतिक स्रोतों को संरक्षण देने की नीति पर चलना होगा। वर्षा जल का प्रबंधन करना होगा। साथ ही दूषित पानी के शोधन की क्षमता विकसित करनी होगी। इसके अलावा भूजल के इस्तेमाल के लिए कठोर नियम-कायदे बनाने होंगे। सिंचाई के लिए पानी का अकुशल इस्तेमाल रोकना होगा। इसके लिए सूक्ष्म सिंचाई तकनीक जैसे ड्रिप और फव्वारा सिंचाई के उपयोग को बढ़ावा देना होगा। वहीं शहरों में वाटर हार्वेटिंग सिस्टम को अनिवार्य रूप से लागू करना होगा। यदि ऐसा नहीं किया गया तो आने वाली पीढिय़ां बूंद-बंूद पानी को तरस जाएंगी।

Pin It