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स्वच्छता सर्वेक्षण परिणामों के निहितार्थ

स्वच्छता सर्वेक्षण परिणामों के निहितार्थ

sanjay sharma

सवाल यह है कि तमाम कवायदों के बावजूद लखनऊ स्वच्छता के मामले में इतना पीछे क्यों है? सफाईकर्मियों की भारी-भरकम फौज के बावजूद राजधानी टॉप टेन की सूची में अपना स्थान क्यों नहीं बना पा रही है? शहर की साफ-सफाई को दुरुस्त करने के लिए जारी किया जाने वाला भारी-भरकम बजट कहां खर्च हो रहा है?

स्वच्छता सर्वेक्षण के परिणामों में मध्य प्रदेश का इंदौर शहर लगातार चौथी बार शीर्ष पर है। गुजरात के सूरत को दूसरा और महाराष्टï्र की नवी मुंबई को तीसरा स्थान मिला है। उत्तर प्रदेश का कोई भी शहर टॉप टेन में भी शामिल नहीं हो सका है। राजधानी लखनऊ 12वें पायदान पर है। हालांकि पिछले साल की अपेक्षा लखनऊ ने लंबी छलांग लगाई है। सवाल यह है कि तमाम कवायदों के बावजूद लखनऊ स्वच्छता के मामले में इतना पीछे क्यों है? सफाईकर्मियों की भारी-भरकम फौज के बावजूद राजधानी टॉप टेन की सूची में अपना स्थान क्यों नहीं बना पा रही है? शहर की साफ-सफाई को दुरुस्त करने के लिए जारी किया जाने वाला भारी-भरकम बजट कहां खर्च हो रहा है? क्या भ्रष्टïाचार ने पूरे तंत्र को चौपट कर दिया है? क्या ऐसे ही राजधानी को स्मार्ट बनाया जा सकेगा? क्या ताजा रैकिंग से नगर निगम कोई सबक लेगा?
किसी प्रदेश की राजधानी उसके विकास का प्रतिनिधित्व करती है। वह राज्य के अन्य शहरों के लिए रोल मॉडल का भी काम करती है। स्वच्छता सर्वेक्षण तमाम मानकों पर शहरों की साफ-सफाई व्यवस्था को परखता है और इसके बाद उसे रैकिंग दी जाती है। दस लाख से अधिक की आबादी वाले शहरों में लखनऊ को स्वच्छता में 12वीं रैंक मिली है। लखनऊ को चमकाने की जिम्मेदारी नगर निगम के पास है। इसके लिए सफाईकर्मियों की भारी-भरकम फौज है। निगम के प्लान को जमीन पर उतारने के लिए पर्याप्त अफसर और कर्मचारी हैं। सरकार हर साल भारी-भरकम बजट जारी करती है। बावजूद इसके यदि स्वच्छता सर्वेक्षण की रैकिंग में राजधानी टॉप टेन में भी शामिल नहीं हो पा रही है तो यह गंभीर चिंता का विषय है। हकीकत यह है कि अभी तक शहर की साफ-सफाई की व्यवस्था दुरुस्त नहीं हो सकी है। शहर के तमाम बाजारों में गंदगी का साम्राज्य है। कुछ पॉश इलाकों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश इलाकों में रोजाना सफाई तक नहीं की जाती है। नाले और नालियां चोक रहती हैं और हल्की बारिश में नालों का गंदा पानी सडक़ों पर बहने लगता है। यही नहीं शहर में कूड़ा निस्तारण की कोई समुचित व्यवस्था तक नहीं की गई है। आज भी शहरी इलाकों में अवैध डेयरियां संचालित हो रही हैं और वे यहां-वहां गंदगी फैला रही हैं। घर-घर कूड़ा उठान की व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। पुराने शहर की हालत और भी बदतर है। ऐसी व्यवस्था में शहर को टॉप टेन में नहीं लाया जा सकता है। जाहिर है नगर निगम को ताजा रैकिंग से खुश होने की जगह सबक लेने की जरूरत है। अन्यथा शहर को स्मार्ट बनाने के सपने को साकार करना मुश्किल होगा।

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