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विरोध प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मायने

विरोध प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मायने

sanjay sharma

सवाल यह है कि जनहित के मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट को बार-बार हस्तक्षेप क्यों करना पड़ता है? क्या पुलिस प्रशासन और सरकारें अपनी जिम्मेदारियों का पालन करने में नाकाम हैं? क्या शीर्ष अदालत के आदेश के बिना वे कानून व्यवस्था बनाए रखने में भी अपने अधिकारों का प्रयोग नहीं करना चाहती हैं? क्या निहित स्वार्थों के कारण सरकारें ऐसा करती हैं? क्या कुछ लोगों को नागरिकों के अधिकारों के हनन की छूट दी जा सकती है?

सीएए और एनआरसी को लेकर दिल्ली के शाहीन बाग की मुख्य सडक़ पर करीब सौ दिनों तक प्रदर्शकारियों द्वारा धरना-प्रदर्शन करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि प्रदर्शन के नाम पर किसी सार्वजनिक स्थल या सडक़ को रोका नहीं जा सकता क्योंकि इससे आम जनता के अधिकारों का हनन होता है। ऐसे विरोध प्रदर्शनों को खत्म कराने के लिए पुलिस और प्रशासन स्वतंत्र है। सवाल यह है कि जनहित के मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट को बार-बार हस्तक्षेप क्यों करना पड़ता है? क्या पुलिस प्रशासन और सरकारें अपनी जिम्मेदारियों का पालन करने में नाकाम हैं? क्या शीर्ष अदालत के आदेश के बिना वे कानून व्यवस्था बनाए रखने में भी अपने अधिकारों का प्रयोग नहीं करना चाहती हैं? क्या निहित स्वार्थों के कारण सरकारें ऐसा करती हैं? क्या कुछ लोगों को नागरिकों के अधिकारों के हनन की छूट दी जा सकती है? क्या पुलिस प्रशासन अपने स्वविवेक से काम नहीं करना चाहता है या संबंधित सरकारें उनका हाथ बांध देती हैं? क्या सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश से सरकारें कोई सबक सीखेंगी?
भारत एक लोकतांत्रिक देश है और यहां नागरिकों को अपनी मांगों को लेकर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने का संवैधानिक अधिकार मिला है लेकिन यह विरोध प्रदर्शन दूसरे के अधिकारों का हनन करके नहीं किया जा सकता। बावजूद इसके इस अधिकार का लगातार दुरुपयोग किया जाता है। धरना-प्रदर्शन के नाम पर सडक़ों पर जाम लगा दिया जाता है। सार्वजनिक स्थलों पर कई-कई दिनों तक धरना दिया जाता है। रेल पटरियों पर प्रदर्शनकारी बैठ जाते हैं। यही नहीं कई बार सरकारी वाहनों को आग के हवाले कर दिया जाता है। दुकानों में तोडफ़ोड़ की जाती है। सीएए और एनआरसी के विरोध के दौरान पूरे देश में कुछ ऐसा ही मंजर दिखाई पड़ा था। दिल्ली के शाहीन बाग की मुख्य सडक़ पर प्रदर्शनकारियों ने कब्जा कर लिया था और करीब सौ दिनों तक वहीं बैठे रहे। हालांकि कोरोना काल के कारण पुलिस ने उनको हटा दिया है लेकिन इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी। इसी पर फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सडक़ और सार्वजनिक स्थलों पर धरना-प्रदर्शन को गैरकानूनी करार दे दिया है। साथ ही पुलिस प्रशासन को ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की छूट दी है। जाहिर है सरकारें सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का निकट भविष्य में सख्ती से पालन कराएगी और आम लोगों के अधिकारों का हनन न हो इसके लिए जरूरी कार्रवाई सुनिश्चित करेगी। वहीं प्रदर्शनकारियों को भी अपने अधिकारों की सीमाओं को समझना होगा ताकि दूसरों को कष्टï न हो।

https://www.youtube.com/watch?v=pvRJWQ9xEuE

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