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मेरी कोरोना डायरी… आठवां दिन और हो गयी अस्पताल से घर की रवानगी

मेरी कोरोना डायरी… आठवां दिन और हो गयी अस्पताल से घर की रवानगी

4pm news

कई दिन पहले लिख दिया था कि बुधवार को घर जाना है तो सुबह से ही तरकीबें लगानी शुरू कर दी थी मैंने। डॉक्टर से कहा कि तीन दिन घर पर बीमार था और नौ दिन यहां हो गए। चार दिन घर पर आईसोलेशन में रह लूंगा… छोड़ दीजिए। डॉक्टर भी थोड़ा कंफ्यूजन में थे। शुगर का पेशेंट होने के कारण दुविधा ज्यादा थी। मैंने भी खुद को बेहतर किया। जब नर्स ऑक्सीजन चेक करने आती, उससे पहले ही गहरी-गहरी सांसें लेने लगता, जिससे लेबल 95 से नीचे न आए। तरकीब काम आ गयी और चार बजे कह दिया गया कि आप जा सकते हैं। सात दिन तक दवा खाते रहिए। चार दिन बाद कोरोना का टेस्ट करा लीजिए, तब तक घर में आईसोलेशन में रहिए। मैंने इतनी जल्दी पैकिंग की कि कहीं यह अस्पताल के लोग अपना इरादा फिर न बदल दे।
सबसे बड़ी चिंता यह थी कि मेरी फाच्र्यूनर गाड़ी नीचे खड़ी थी, खुद चला कर लाया था। लगा, नौ दिन में कहीं बैटरी ही डिस्चार्ज न हो गयी हो पर यहां भी तकदीर काम कर गयी। बैठते ही गाड़ी स्टार्ट और कोरोना पीडि़त मैं खुले आसमान में खुली सडक़ पर निकल पड़ा। महसूस कर सकता हूं कि जो लोग जेल से बाहर आते होंगे, लंबे समय के बाद तो उनको कैसा लगता होगा।
घर में किसी को पता नहीं था कि मैं आ रहा हूं। कुछ दोस्तों को वीडियो कॉल की तो देखकर भौचक्के हो गए। सबसे मजा तब आया जब राणा प्रताप मार्ग पर पहुंचने से पहले मैने अर्चना दीदी से कहा, गेट पर दिल्ली से एक साहब आये हैं उनसे पेपर ले लीजिये। बाहर निकलीं तो गाड़ी में मैं था। देखकर भौंचक्की रह गयीं। उन्होंने दूर से ही बात की, मैंने कहा अभी दूरी ही सही है। सोसाइटी पहुंचा, ड्राइवर देख कर हैरान। सारा सामान गाड़ी में छोड़ा और कहा गाड़ी को एक हफ्ते हाथ मत लगाना। सारे कपड़े आदि एक हफ्ते बाद ड्राई क्लीन को चले जाएंगे। लिफ्ट के बटन को छूने के लिए पहले ही उपकरण हाथ में थे। अकेले लिफ्ट में ऊपर आया और घंटी बजायी। कैमरे में मेरी शक्ल देखते ही हडक़ंप मचा। आवाज आयी, रुको बिना बताए आए हो तो दो मिनट रुको। खींज भी आयी कि क्यों रोका जा रहा है। मोनी से कहा, पानी दे दो और सेनेटाइजर, जिससे पैर साफ कर लिए जाएं। दो से तीन मिनट में दरवाजा खुला पर तेज म्यूजिक के साथ बबिता ने पहले गाना लगाया तूने मारी एंट्रियां तो दिल में बजी घंटियां। वन्या अपने प्यारे काई को जंजीर से बांधी खड़ी थी तो सिद्धार्थ भी भौचक्का था। सभी ने मेरे घर लौटने पर बड़ी प्लानिंग की थी। यह बाद में पता चला पर बबिता के हाथ में माला लग गयी। मैंने कहा पास नहीं आना है, दूर से माला फेंकी मैडम ने और सीधे मेरे गले में। मोनी वीडियो बनाती रही। मंै सीधे कमरे में, मेरे लिये मोनी की मामी खुशी ने खासतौर पर अस्पताल भेजने को एगकरी बना कर भेजी थी पर मैं यही आ गया था। कह दिया कोई भी मेरे ऊपर के कमरे में नहीं आएगा। आते ही अपने पसंद के बाथरूम में शॉवर के नीचे दस मिनट बैठा रहा और कमरे में तेज आवाज म्यूजिक चलता रहा। रात में खाने के लिये मैंने कहा, चार रोटी और एगकरी बाहर रख दो मैं उठा लूंगा पर कोई तैयार नहीं हुआ कि एक-एक गर्म रोटी दी जायेगी। नौ दिन बाद गर्म खाना खाने को मिला। रात को सोने से पहले डर था कि ऑक्सीजन लेबल गड़बड़ न हो। डॉक्टर त्रिपाठी नाराज थे कि अस्पताल से ऐसे नहीं आना चाहिए। ईश्वर की कृपा रही कि अभी तक सेहत सही है। दवा सात दिन चलेगी। बुखार नहीं है। अगले तीन दिन इसी कमरे में कटने है। यह मेरी याद्ïदाश्त में पहला इतना लंबा अस्पताल दौरा था। बचपन में दाहिने पैर में पोलियो हो गया था। छठी क्लास तक तलवे से लेकर घुटने तक ऐसे जूते पहनता था, जिसको चारो तरफ स्टील की पट्टी रहती थी। एक पैर स्टील के फ्रेम में बंद पर ईश्वर की कृपा से सातवीं क्लास तक सब सही और फिर मैं क्रिकेट और बैडमिंटन दोनों अच्छे से खेलने लगा। तब से कोई दौर नहीं आया जब इतने दिन अस्पताल रहना पड़ा हो। आज सुबह से शुरू हो गया पेपर को लेकर। सेहत सही है। तीन दिन बाद टेस्ट होना है फिर भविष्य तय होगा। आप सभी का आभार इस दौर में प्यार बनाए रखने के लिए।

बबिता ने पहले गाना लगाया तूने मारी एंट्रियां तो दिल में बजी घंटियां। वन्या अपने प्यारे काई को जंजीर से बांधी खड़ी थी तो सिद्धार्थ भी भौचक्का था।

कोरोना पॉजिटिव होने के बाद मैं इरा मेडिकल कॉलेज में एडमिट हूं। बहुत सारे साथियों ने फोन करके कहा कि लिखूं वहां से कि कैसा महसूस कर रहा हूं तो रोज का संस्मरण लिखता रहूंगा। - संजय शर्मा

https://www.youtube.com/watch?v=fnjA37GXWlQ

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