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खाद की कालाबाजारी और सरकारी तंत्र

खाद की कालाबाजारी और सरकारी तंत्र

sanjay sharma

सवाल यह है कि खाद की कालाबाजारी रोकने में सरकारी तंत्र विफल क्यों है? क्या यह सारा धंधा मिलीभगत से चल रहा है? साधन सहकारी समिति में खाद की किल्लत क्यों है? क्या चेकिंग अभियान के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है? सरकार के आदेशों का पालन क्यों नहीं कराया जा रहा है? आखिर किसान के हिस्से की खाद कहां बेची जा रही है?

सरकार के तमाम दावों के बावजूद उत्तर प्रदेश में खाद की कालाबाजारी धड़ल्ले से चल रही है। इसके चलते किसानों को यूरिया खाद नहीं मिल पा रही है। सरकारी खाद वितरण केंद्रों में खाद की अनुपलब्धता के चलते धान और अन्य फसलें नष्टï होने की कगार पर है। सवाल यह है कि खाद की कालाबाजारी रोकने में सरकारी तंत्र विफल क्यों है? क्या यह सारा धंधा मिलीभगत से चल रहा है? साधन सहकारी समिति में खाद की किल्लत क्यों है? क्या चेकिंग अभियान के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है? सरकार के आदेशों का पालन क्यों नहीं कराया जा रहा है? आखिर किसान के हिस्से की खाद कहां बेची जा रही है? क्या इसका असर प्रदेश के अन्न उत्पादन और आर्थिक विकास पर नहीं पड़ेगा?
प्रदेश में यूरिया खाद की कालाबाजारी रुकने का नाम नहीं ले रही है। कोरोना संक्रमण ने पहले से किसानों की कमर तोड़ रखी है उस पर फसलों के लिए खाद की किल्लत ने उनकी परेशानी बढ़ा दी है। हालांकि यूपी सरकार ने खाद की कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ रासुका लगाने का आदेश दे रखा है इसके बावजूद स्थितियों में सुधार नहीं हो रहा है। साधन सहकारी समिति में खाद नहीं मिल रही है। किसान खाद के लिए इन समितियों के चक्कर लगा रहे हैं। गोंडा, बाराबंकी, सोनभद्र, कौशाम्बी, उन्नाव, चंदौली, बदायूं, सुल्तानपुर समेत प्रदेश के तमाम जिलों में यूरिया खाद को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। किसानों को महंगे दाम पर खाद खरीदनी पड़ रही है। इसका असर फसल उत्पादन लागत पर पड़ रहा है। इस समय किसान को धान व अन्य फसलों के लिए खाद की जरूरत है। यदि उसे समय पर खाद नहीं उपलब्ध हुई तो उसकी सारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा। फसल चौपट हो जाएगी। इसमें दो राय नहीं कि खाद की कालाबाजारी सरकारी कर्मियों की मिलीभगत के चलते हो रही है। खाद की कृत्रिम किल्लत पैदा की गई है। वहीं कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ चल रहा अभियान खानापूर्ति बनकर रह गया है। लिहाजा कालाबाजारी करने वालों के हौसले बुलंद हैं और किसान कुछ बोरी खाद के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं। यह स्थिति बेहद गंभीर है। यदि अन्नदाताओं को खाद, बीज और सिंचाई की सुविधा नहीं मिलेगी तो वे कैसे लोगों के लिए खाद्यान्न का उत्पादन कर सकेंगे। अगर किसान किसी तरह कर्ज लेकर फसलों का उत्पादन कर भी लेते हैं तो उनको लागत मूल्य निकालना भी मुश्किल हो जाएगा। यदि प्रदेश सरकार किसानों की आय बढ़ाना चाहती है तो उसे न केवल खाद की कालाबाजारी को रोकना होगा बल्कि इसमें लिप्त लोगों को चिन्हित कर कठोर कार्रवाई भी करनी होगी।

https://www.youtube.com/watch?v=kGFsZp4LZsw

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