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किसानों से छल कब तक?

किसानों से छल कब तक?

sanjay sharma

सवाल यह है कि किसानों की मेहनत की कमाई को लूटने का यह सिलसिला कब तक चलेगा? सरकारी क्रय केंद्रों में फसलें क्यों नहीं खरीदी जा रही हैं? तमाम निगरानी के बावजूद क्रय केंद्रों में चल रहे गोलमाल पर नियंत्रण क्यों नहीं लग पा रहा है? अफसरों की फौज आखिर क्या कर रही है? क्या भ्रष्टïाचार ने पूरे तंत्र को खोखला कर दिया है? न्यूनतम समर्थन मूल्य से किसानों को वंचित क्यों किया जा रहा है?

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में सरकारी कर्मियों की मिलीभगत से आढ़तिए किसानों से धान की फसल औने-पौने दामों में खरीदते मिले जबकि वहीं स्थित सरकारी खरीद केंद्रों पर सन्नाटा पसरा था। डीएम मौके पर पहुंचे तो मामला खुला वरना किसानों को लूटने का पूरा प्लान तैयार था। गुणवत्ता के बावजूद फसल में कम नमी का बहाना बनाकर आढ़तिए किसानों से निर्धारित सरकारी रेट प्रति क्विंटल 1868 रुपये की जगह एक हजार प्रति क्विंटल के भाव से धान खरीद रहे थे। यह घटना एक बानगी भर है। किसानों के साथ ऐसी लूट पूरे देश में हो रही है और इसमें आढ़तियों के साथ सिस्टम की पूरी भागीदारी है। किसानों को लूटने का पूरा नेटवर्क है। सवाल यह है कि किसानों की मेहनत की कमाई को लूटने का यह सिलसिला कब तक चलेगा? सरकारी क्रय केंद्रों में फसलें क्यों नहीं खरीदी जा रही हैं? तमाम निगरानी के बावजूद क्रय केंद्रों में चल रहे गोलमाल पर नियंत्रण क्यों नहीं लग पा रहा है? अफसरों की फौज आखिर क्या कर रही है? क्या भ्रष्टïाचार ने पूरे तंत्र को खोखला कर दिया है? न्यूनतम समर्थन मूल्य से किसानों को वंचित क्यों किया जा रहा है? क्या केवल कानून पास कर देने भर से किसानों का भला हो जाएगा?
केंद्र सरकार किसानों से कई फसलें खुद खरीदती है। इसमें धान की प्रमुख फसल भी शामिल है। इस बार केंद्र ने धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1868 रुपये प्रति क्विंटल घोषित किया है। फसल को खरीदने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने पूरे राज्य में धान क्रय केंद्रों की स्थापना की है लेकिन इन क्रय केंद्रों में कई दिनों तक खड़े रहने के बावजूद किसानों की फसलें नहीं खरीदी जा रही हैं। तमाम बहाने बनाए जा रहे हैं। मसलन, किसानों ने अपना पंजीकरण नहीं कराया है। फर्जी तरीके से फसल में कम नमी बताकर उसे लेने से इंकार किया जा रहा है। जिन किसानों को टोकन मिल जाता है वे भी अपना धान तुलवाने के लिए कई दिनों तक क्रय केंद्रों के सामने डेरा डालने को मजबूर रहते हैं। कई बार ये किसान भी क्रय केंद्रों की मनमानी के कारण अपनी फसल औने-पौने दाम में आढ़तियों को बेचकर चले जाते हैं। सच यह है कि किसानों को लूटने का पूरा नेटवर्क चल रहा है। इसमें सरकारी अधिकारी, क्रय केंद्र के कर्मचारी और आढ़तिएं तीनों शामिल हैं। कर्मचारी फसल की गुणवत्ता खराब बताकर किसानों को आढ़तियों के पास भेज देते हैं और वे इनको कम दाम देकर मोटा मुनाफा कमाते हैं। जाहिर है यदि सरकार किसानों को उनकी फसल का वाजिब दाम दिलाना चाहती है तो उसे कानून नहीं भ्रष्टï सिस्टम में सुधार करना होगा अन्यथा अन्नदाताओं को हर बार ऐसे ही छला जाता रहेगा।

https://www.youtube.com/watch?v=6rSuNFxLumI

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