अनलॉक: फिर घुटने लगा गोमती का दम तेजी से प्रदूषित हो रहा नदी का पानी

पानी में ऑक्सीजन की मात्रा में आई कमी, जलीय जीवों के लिए खतरा बढ़ा
आईआईटीआर की जांच से हुआ खुलासा, फिर से गिरने लगा गोमती में कचरा

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। एक बार फिर गोमती का दम घुटने लगा है। अनलॉक होने के साथ ही गोमती नदी में प्रदूषण का स्तर तेजी से बढऩे लगा है। औद्योगिक इकाइयों के फिर से शुरू होने के साथ गोमती में घातक रसायनों से युक्त पानी गिरने लगा है। इसके कारण प्रदूषण बढ़ रहा है। पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाने से जलीय जीवों के लिए खतरा बढ़ गया है। वहीं टीएसएस की मात्रा भी चिंताजनक स्तर तक बढ़ गई है। आईआईटीआर की रिपोर्ट से इसका खुलासा हुआ है।
लॉकडाउन के दौरान गोमती की सेहत सुधरने लगी थी। इसका मुख्य कारण बंद पड़ी फैक्ट्रियां रहीं। इनके बंद होने के कारण केमिकल युक्त पानी नदी में नहीं गिर रहा था। इसके कारण स्थितियों में सुधार आना शुरू हो गया था। लॉकडाउन से पहले गोमती नदी में डिसॉल्व ऑक्सीजन (डीओ) काफी कम था जो लॉकडाउन के दौरान के दौरान कई फीसदी बढ़ गया था। यह नदी में रहने वाले जीवों और पौधों के लिए जरूरी होता है लेकिन अनलॉक होने के साथ ही गोमती नदी के पानी में डिसॉल्व ऑक्सीजन 6.8 से घटकर 4.0 हो गई जबकि बीओडी 9.0 से बढक़र 12.0 पहुंच गई है।
भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान (आईआईटीआर)ने शहर के नौ स्थलों से सैंपलिंग की तो नतीजे चौंकाने वाले मिले थे। गोमती के पानी की पड़ताल में पाया गया कि जनवरी की तुलना में अप्रैल और मई के बीच डिजॉल्व ऑक्सीजन (डीओ), बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी), टोटल व फीकल कॉलीफॉर्म काफी घट गए, जिससे प्रदूषण की भयावहता में कमी आई। आईआईटीआर की ओर से शहर के नौ स्थानों घैला पुल, कुडिय़ा घाट, शहीद स्मारक, आईआईटीआर के सामने, खाटू श्याम मंदिर, भैसा कुंड, रिवरफ्रंट व भरवारा निकट इकाना स्टेडियम पर गोमती नदी के नमूनों की जांच की गई। जांच टीम का कहना है कि लॉकडाउन के दौरान तमाम गतिविधियां बंद थी, इसलिए यह कमी देखने को मिली। हालांकि मॉनीटरिंग स्थलों पर इसका स्तर अभी भी मानक के मुकाबले 4 से 6 गुना अधिक है। शहीद स्मारक पर अधिक सुधार नहीं दिखा। वहीं, भैसाकुंड व भरवारा पर बीओडी का स्तर खराब स्थिति में मिला। मलजनित फीकल कॉलीफॉर्म जीवाणुओं की संख्या मानक के अनुसार 100 मिलीलीटर में 50 होनी चाहिए थी लेकिन सभी स्थलों पर इसकी स्थिति भयावह है। जनवरी के मुकाबले मई में इसकी संख्या में 40 से 50 फीसद की कमी आई थी । टोटल कॉलीफॉर्म जीवाणुओं में 15 से 20 फीसदी की तुलनात्मक कमी आंकी गई। आईआईटीआर के निदेशक प्रोफेसर आलोक धवन बताते हैं कि जनवरी में जल नमूने वैज्ञानिकों ने कलेक्ट किए गए थे। अप्रैल और मई में लॉकडाउन था इसलिए हमने ड्रोन का प्रयोग करके गोमती के जल नमूनों को एकत्र किया था।

औद्योगिक इकाइयों के शुरू होते ही दिखने लगा असर

पीलीभीत से निकली गोमती नदी शाहजहांपुर, खीरी, सीतापुर, लखनऊ, सुल्तानपुर होते हुए जौनपुर जाती है और फिर गाजीपुर जिले की सीमा पर गंगा में समाहित हो जाती है। अंतिम छोर पर स्थित होने के कारण बड़े शहरों में नदी किनारे स्थापित औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला रसायन युक्त सीवेज नदी के पानी को प्रदूषित करता है। इस कारण सामान्य दिनों में नदी का पानी काला नजर आता है। राजधानी लखनऊ की सर्राफा मंडी में आभूषणों की सफाई में इस्तेमाल होने वाला तेजाब का पानी नालियों के जरिए फिर से नदी में गिरने लगा है। शहरी क्षेत्र में ही करीब सात बड़े नाले नदी में गिरते हैं, जिनमें घरेलू सीवेज के अलावा दुकानों व व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का कचरा भी होता है। औद्योगिक इकाइयों के खुलने के बाद हालात फिर से बिगडऩे लगे हैं। गोमती का पानी फिर काले और गहरे रंग में दिखने लगा है।

टीएएस की मात्रा बढ़ी

पड़ताल में चार स्थानों शहीद स्मारक, भैसा कुंड, रिवरफ्रंट और भरवारा में आंशिक सुधार देखा गया। इन स्थानों पर डीओ 6.20 से 6.70 मिलीग्राम प्रति लीटर की सुरक्षित सीमा में पहुंच गया लेकिन कुछ स्थानों पर गोमती में भारी धातु जैसे जिंक, कैडमियम, मैग्नीज, निकिल, लेड भी मामूली स्तर में मिली। हालांकि टोटल सस्पेंडेड सॉलिड्स (टीएसएस) की मात्रा कई स्थानों पर अधिक पाई गई।

नहीं छोडऩा पड़ा पानी

हर साल मार्च में ही गोमती का जलस्तर बहुत कम होने लगता था। इसके चलते जलकल विभाग को जलापूर्ति के लिए सिंचाई विभाग से पानी मांगना पड़ता था। इस बार अच्छी बात यह रही कि गोमती में पानी नहीं छोडऩा पड़ा। जलकल विभाग के महाप्रबंधक एसके वर्मा बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान गोमती का जलस्तर जहां 346.8 फीट बना रहा। वहीं, जल की गुणवत्ता भी अच्छी रही।

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