NDTV पत्रकार रवीश का भारतीय पुलिस सेवा के नाम एक पत्र!

प्रिय भारतीय पुलिस सेवा ( उत्तर प्रदेश),

Captureउम्मीद है मुुकुल द्विवेदी की मौत के सन्नाटे का कुछ कुछ हिस्सा आप सभी के आस पास भी पसरा होगा। उनकी यादें रह रहकर आ जा रही होंगी। कोई पुरानी बात याद आ रही होगी, कुछ हाल की बात याद आ रही होगी। ट्रेनिंग के समय अकादमी की चोटी से हैदराबाद देखना याद आ रहा होगा। किसी को मथुरा दर्शन के बाद वहां की खातिरदारी याद आती होगी। कुछ आदर्श याद आते होंगे। बहुत सारे समझौते याद आते होंगे।
मैं यह पत्र इसलिए नहीं लिख रहा कि एक आईपीएस अधिकारी मुकुल द्विवेदी की मौत हुई है। मुझे सब इंस्पेक्टर संतोष यादव की मौत का भी उतना ही दुख है। उतना ही दुख जियाउल हक की हत्या पर हुआ था। उतना ही दुख तब हुआ था जब मध्य प्रदेश में आईपीएस नरेंद्र कुमार को खनन माफिया ने कुचल दिया था। दरअसल कहने के लिए कुछ खास है नहीं लेकिन आपकी चुप्पी के कारण लिखना पड़ रहा है। गैरत और जमीर की चुप्पी मुझे परेशान करती है। इसी वजह से लिख रहा हूं कि आप लोगों को अपने मातहतों की मौत पर चुप होते तो देखा है मगर यकीन नहीं हो रहा है कि आप अपने वरिष्ठ, समकक्ष या कनिष्ठ की मौत पर भी चुप रह जायेंगे। मैं बस महसूस करना चाहता हंू कि आप लोग इस वक्त क्या सोच रहे हैं। क्या वही सोच रहे हैं जो मैं सोच रहा हूं? क्या कुछ ऐसा सोच रहे हैं जिससे आपके सोचने से कुछ हो या ऐसा सोच रहे हैं कि क्या किया जा सकता है। जो चल रहा है चलता रहेगा। मैं यह इसलिए पूछ रहा हूं कि आपके साथी मुकुल द्विवेदी का मुस्कुराता चेहरा मुझे परेशान कर रहा है। मैं उन्हें बिलकुल नहीं जानता था। कभी मिला भी नहीं। लेकिन अपने दोस्तों से उनकी तारीफ सुनकर पूछने का मन कर रहा है कि उनके विभाग के लोग क्या सोचते हैं। मैंने कभी यूपीएससी की परीक्षा नहीं दी। बहुत अच्छा विद्यार्थी नहीं था इसलिए किसी प्रकार का भ्रम भी नहीं था। जब पढऩा समझ में आया तब तक मैं जीवन में रटने की आदत से तंग आ गया था। जीएस की उस मोटी किताब को रटने का धीरज नहीं बचा था। इसका मतलब ये नहीं कि लोक जीवन में लोकसेवक की भूमिका को कभी कम समझा हो। आपका काम बहुत अहम है और आज भी लाखों लोग उस मुकाम पर पहुंचने का ख्वाब देखते हैं। दरअसल ख्वाबों का तआल्लुक अवसरों की उपलब्धता से होता है। हमारे देश की जवानियां, जिस पर मुझे कभी नाज नहीं रहा, नंबर लाने और मुलाजमत के सपने देखने में ही खप जाती हैं। बाकी हिस्सा वो इस ख्वाब को देखने की कीमत वसूलने में खपा देती हैं। जिसे हम दहेज से लेकर रिश्वत और राजनीतिक निष्ठा क्या क्या नहीं कहते हैं। मैं इस वक्त आप लोगों के बीच अपवादस्वरूप अफसरों की बात नहीं कर रहा हूं। उस विभाग की बात कर रहा हूं जो हर राज्य में वर्षों से भरभरा कर गिरता जा रहा है। जो खंडहर हो चुका है। मैं उन खंडहरों में वर्दी और कानून से लैस खूबसूरत नौजवान और वर्दी पहनते ही वृद्ध हो चुके अफसरों की बात कर रहा हूं जिनकी जिले में पोस्टिंग होते ही स्वागत में अखबारों के पन्नों पर गुलाब के फूल बिखेर दिये जाते हैं। जिनके आईपीएस बनने पर हम लोग उनके गांव घरों तक कैमरा लेकर जाते हैं। शायद आम लोगों के लिए कुछ कर देने का ख्वाब कहीं बचा रह गया है जो आपकी सफलता को लोगों की सफलता बना देता होगा। इसलिए हम हर साल आपके आदर्शों को रिकार्ड करते हैं। हर साल आपको अपने उन आदर्शों को मारते हुए भी देखते हैं।
क्या आप भारतीय पुलिस सेवा नाम के खंडहर को देख पा रहे हैं? क्या आपकी वर्दी कभी खंडहर की दीवारों से चिपकी सफेद पपडिय़ों से टकराती है? रंग जाती है? आपके बीच बेहतर, निष्पक्ष और तत्पर पुलिस बनने के ख्वाब मर गए हैं। इसलिए आपको एसएसपी के उदास दफ्तरों की दीवारों का रंग नहीं दिखता। मुझे आपके ख्वाबों को मारने वाले का नाम पता है मगर मैं मरने और मारे जाने वालों से पूछना चाहता हूं। आपके कई साथियों को दिल्ली से लेकर तमाम राज्यों में कमिश्नर बनने के बाद राज्यपाल से लेकर सांसद और आयोगों के सदस्य बनने की चाह में गिरते देखा हूं। मुझे कोई पहाड़ा न पढ़ाये कि राजनीतिक व्यवस्थाएं आपको ये इनाम आपके हुनर और अनुभव के बदले देती हैं।
आप सब इस व्यवस्था के अनुसार हो गए हैं जो दरअसल किसी के अनुसार नहीं है। आप सबने हर जगह समर्पण किया है और अब हालत ये हो गई कि आप अपने गम का भी इजहार नहीं कर सकते। गर्मी है इसलिए पता भी नहीं चलता होगा कि वर्दी पसीने से भीगी या दोस्त के गम के आंसू से। मुझे कर्तव्य निष्ठा और परायणता का पाठ मत पढ़ाइये। इस निष्ठा का पेड़ा बनाकर आपके बीच के दो चार अफसर खा रहे हैं और बाकी लोग खाने के मौके की तलाश कर रहे हैं।
मामूली घटनाओं से लेकर आतंकवाद के नाम पर झूठे आरोपों में फंसाये गए नौजवानों के किस्से बताते हैं कि भारतीय पुलिस सेवा के खंडहर अब ढहने लगे हैं। दंगों से लेकर बलवों में या तो आप चुप रहे, जाँच अधूरी की और किसी को भी फँसा दिया। आपने देखा होगा कि गुजरात में कितने आईपीएस जेल गए। एक तो जेल से बाहर आकर नृत्य कर रहा था। वो दृश्य बता रहा था कि भारतीय पुलिस सेवा का इकबाल ध्वस्त हो चुका है। भारतीय पुलिस सेवा की वो तस्वीर फ्रेम कराकर अपने अपने राज्यों के आफिसर्स मेस में लगा दीजिये। पतन में भी आनंद होता है। उस तस्वीर को देख आपको कभी कभी आनंद भी आएगा। रिबेरो साहब के बारे में पढ़ा था तब से उन्हीं के बारे में और उनका ही लिखा पढ़ रहा हूं। बाकी भी लिखने वाले आए लेकिन वो आपके नाम पर लिखते लिखते उसकी कीमत वसूलने लगे। पुलिस सुधार के नाम पर कुछ लोगों ने दुकान चला रखी है। इस इंतजार में कि कब कोई पद मिलेगा। मैं नाम लूं क्या ? एक राज्य में बीच चुनावों में आपके बीच के लोगों की जातिगत और धार्मिक निष्ठाओं की कहानी सुन कर सन्न रह गया था। बताऊं क्या? क्या आपको पता नहीं? अभी ही देखिये कुछ रिटायर लोग मुकुल की मौत के बहाने पुलिस सुधार का सवाल उठाते उठाते सेटिंग में लग गए हैं। खुद जैसे नौकरी में थे तो बहुत सुधार कर गए ।
आपकी सीमायें समझता हूं। यह भी जानता हूं कि आपके बीच कुछ शानदार लोग हैं। कुछ के बीच आदर्शवाद अब भी बचा है। बस ये पत्र उन्हीं जैसों के लिए लिख रहा हूं और उन जैसों के लिए भी जो पढ़ कर रूटीन हो जायेंगे। इन बचे खुचे आदर्श और सामान से एक नई इमारत बना लीजिये और फिर से एक लोक विभाग बनिये जिसकी पहचान बस इतनी हो कि कोई पेशेवर और निष्पक्ष होने पर सवाल न उठा सके। अपनी खोई हुई जमीन को हासिल कीजिये। अकेले बोलने में डर लगता है तो एक दूसरे का हाथ पकड़ कर बोलिये। इसके लिए जरूरी है कि आप पहले मथुरा के जिलाधिकारी और एसएसपी से यारी दोस्ती में ही पूछ लीजिये कि आखिर वहां ये नौबत क्यों आई। किसके कहने पर हम ऐसे सनकी लोगों को दो से दो हजार होने दिये। वे हथियार जमा करते रहे और हम क्यों चुप रहे। क्या मुकुल व्यवस्था और राजनीति के किसी खतरनाक मंसूबों के कारण मारा गया? क्या कल हममें से भी कोई मारा जा सकता है? मुकुल क्यों मारा गया? कुछ जवाब उनके होंठों पर देखिये और कुछ उनकी आंखों में ढूंढिये। क्या ये मौत आप सबकी नाकामी का परिणाम है? मथुरा के जिलाधिकारी, एसएस पी जब भी मिले, जहां भी मिले, आफिसर मेस से लेकर हजरतगंज के आइसक्रीम पार्लर तक, पूछिये। खुद से भी पूछते रहिए।
पता कीजिये कि इस घटना के तार कहां तक जाते हैं। नजर दौड़ाइये कि ऐसी कितनी संभावित घटनाओं के तार यहां वहां बिखरे हैं। राजनीतिक कब्जों से परेशान किसी गरीब की ज़मीन वापस दिलाइये। संतोष यादव और मुकुल द्विवेदी के घर जाइये। उनके परिवारों का सामना कीजिये और कहिये कि दरअसल साहब से लेकर अर्दली तक हम अतीत, वर्तमान और भावी सरकारों के समझौतों पर पर्दा डालने के खेल में इतने अभ्यस्त हो गए हैं कि हम सभी को मरा हुआ मान लिया जाना चाहिए। हम सबको जीते जी मुआवजा मिल जाना चाहिए। नहीं कहने की लाचारी से निकलिये साहब लोग। रिटायर लोग के भरोसे मत रहिए। बोलने की जगह बनाइये। आपकी नौकरी हमारी तरह नहीं है कि दो मिनट में चलता कर दिये गए। हममें से कई फिर भी बहुत कुछ सबके लिए बोल देते हैं। आप सरकारों के इशारों पर हमारे खिलाफ एफ आई आर करते हैं फिर भी हम बोल देते हैं। राना अय्यूब की गुजरात फाइल्स मंगाई की नहीं। आप कम से कम भारतीय पुलिस सेवा के भारतीय होने का फर्ज तो अदा करें। आप हर जगह सरकारों के इशारों पर काम कर रहे हैं। कभी-कभी अपने जमीर का इशारा भी देख लीजिये। तबादला और पदोन्नति के बदले इतनी बड़ी कीमत मत चुकाइये। हम सही में कुछ राज्यों के राज्यपालों का नाम नहीं जानते हैं। कुछ आयोगों के सदस्यों का नाम नहीं जानते हैं। इन पदों के लिए चुप मत रहिए। सेवा में रहते हुए लडि़ए। बोलिये। इन समझौतों के खिलाफ बोलिये। अपने महकमे की साख के लिए बोलिये कि मथुरा में क्या हुआ, क्यों हुआ। बात कीजिये कि आपके बीच लोग किस किस आधार पर बंट गए हैं। डायरी ही लिखिये कि आपके बीच का कोई ईमानदारी से लड़ रहा था तो आप सब चुप थे । आपने अकेला छोड़ दिया। भारतीय प्रशासनिक सेवा हो या पुलिस सेवा सबकी यही कहानी है। वरना एक दिन किसी पार्क में जब आप रूलर लेकर वॉक कर रहे होंगे और कहीं मुकुल द्विवेदी टकरा गए तो आप उनका सामना कैसे करेंगे ? यार हमने तुम्हारी मौत के बाद भी जैसा चल रहा था वैसा ही चलने दिया। क्या ये जवाब देंगे? क्या यार हमने इसी दिन के लिए पुलिस बनने का सपना देखा था कि हम सब अपने अपने जुगाड़ में लग जायेंगे। मैं मारा जाऊंगा और तुम जीते जीते जी मर जाओगे। कहीं मुकुल ने ये कह दिया तो!
आप सभी की खैरियत चाहने वाला मगर इसके बदले राज्यपाल या सांसद बनने की चाह न रखने वाला रवीश कुमार इस पत्र का लेखक हैं। डाकिया गंगाजल लाने गया है इसलिए मैं इसे अपने ब्लाग कस्बा पर पोस्ट कर रहा हूं। आमीन !

Pin It