कांग्रेस को लगा दिया दांव पर

ललित गर्ग

राजनीति हमेशा नए चैलेंज पैदा करती रहती है, इसलिए इन चुनौतियों से पार पाने के लिये नए लीडर्स की हर राजनीतिक दल को आवश्यकता है। जो भी राजनीतकि दल इसकी तैयारी में रहता है, वह आने वाले संकटों से पार पा लेता है, लेकिन देश की सबसे प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस नये लीडर्स तैयार करने एवं पहले से स्थापित कद्दावर नेताओं की उपेक्षा के कारण दिनोंदिन अपने अस्तित्व एवं अस्मिता को खो रही है। ज्योतिरादित्य सिंधिया का कांग्रेस छोडक़र भाजपा में शामिल होना एक ऐसी ही घटना है, जिससे एक बार फिर कांग्रेस कमजोर हुई है।
आखिर इस बात पर बहस क्यों नहीं होती कि योग्य, युवा और प्रतिबद्ध कांग्रेसियों को पाटी क्यों छोडऩी पड़ रही है? कांग्रेस की वर्तमान दुर्दशा के लिये जिम्मेदार तत्वों पर बहस होना पार्टी ही नहीं बल्कि लोकतंत्र की जीवंतता के लिये भी जरूरी है। कांग्रेस की बेहतरी की उम्मीद के लिये जरूरी है कि मौजूदा लीडर्स पर ऐसा सिस्टम लागू करने के लिए दबाव बनाएं, जो तटस्थ होकर अपना काम करते रहें, उन्हें उनकी योग्यता के अनुरूप प्रोत्साहन एवं पद प्राप्त होते रहे। ऐसा नहीं होने पर पार्टी की टूटन एवं बिखराव स्वाभाविक है। कांग्रेस में आज जो बिखरावमूलक स्थिति देखने को मिल रही है, उससे न केवल वह अपना राष्ट्रीय धरातल खो रही है बल्कि धीरे-धीरे कुछ राज्यों में सिमटती जा रही है। क्या वह स्वयं ही अपनी गलत नीतियों एवं पूर्वाग्रहों के कारण कांग्रेस-मुक्त भारत की ओर नहीं बढ़ रही है ? क्या जिन लोगों ने अपने खून-पसीने से कांग्रेस को खड़ा-बड़ा किया, वे एक व्यक्ति और परिवार के लिए उसे दांव पर इसी तरह लगातार लगाते रहेंगे ? कांग्रेस पार्टी में यह मर्ज बहुत पुराना है, लेकिन आज केन्द्रीय नेतृत्व की लगातार कमजोर होती स्थितियों के कारण वह विकराल रूप लेता जा रहा है। मध्य प्रदेश में कमलनाथ की सरकार ने बहुमत परीक्षण से पहले ही मैदान छोड़ दिया। उनकी सरकार का पतन तभी सुनिश्चित हो गया था, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपनी लगातार उपेक्षाओं के चलते भाजपा में जाने का निर्णय लिया। संभवत: उनके जैसा असंतोष एवं पार्टी नीतियों से मतभेद अन्य नेताओं में भी पनप रहा है, जो निकट भविष्य में सामने फट सकता है। लेकिन इस बड़ी घटना से भी पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व ने कोई सबक लिया हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता। राहुल ने यह तो माना कि ज्योतिरादित्य को कांग्रेस में अपना भविष्य नहीं दिख रहा था, लेकिन यह नहीं बताया कि ऐसा क्यों था ? पार्टी के कर्ता-धर्ता माने जाने वाले राहुल को यह बताना चाहिए था कि ज्योतिरादित्य सरीखे उसके नेताओं को कांग्रेस में अपना भविष्य बेहतर क्यों नहीं दिखा? जो नेता कांग्रेस छोड़ रहे हैं, वे यही कह रहे हैं कि गांधी परिवार समय रहते सही निर्णय नहीं ले पा रहा है। यह दिख भी रहा है। बड़ा कारण तो यही है कि अनेक दिग्गज नेता गांधी परिवार की जी-हुजूरी करते हुए ऊब गये हैं।
बात ज्योतिरादित्य की ही नहीं है, पूर्व में ऐसी अनिर्णय, उपेक्षा, उचित प्रोत्साहन एवं पद न मिलने एवं स्पष्ट नीतियों के अभाव की स्थितियों में अनेक कांग्रेसी नेता पार्टी से विमुख होते रहे हैं। बीजू पटनायक, चौधरी चरण सिंह, रीता बहुगुणा जोशी, जगदंबिका पाल, शरद पवार, ममता बनर्जी, जगन मोहन रेड्डी, जयंती नटराजन, के. चंद्रशेखर राव, हिमंत बिस्व सरमा आदि नेताओं की लंबी सूची है, जो कांग्रेस छोड़ गए। प्रश्न यह है कि यदि कोई राष्ट्रीय पार्टी अनेक राज्यों में अपने नेताओं को खोती जाए, तो उसका जनाधार बचेगा कैसे ? नरेन्द्र मोदी के जादुई प्रभाव से अधिक यह पार्टी स्वयं के कारणों एवं नीतियों के कारण धराशायी हो रही है।
कांग्रेस पार्टी नेतृत्व संकट से गुजर रही है। पार्टी अगर केन्द्रीय लीडरशीप की कमी से मुरझा रही है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि पार्टी के पास ऐसे लीडर नहीं हैं, बल्कि यह है कि उसने अपने भीतर उचित लीडरशिप को जगह देने की सोच ही विकसित करना छोड़ दिया है। वह यह नहीं सोच एवं समझ पा रही कि दूरगामी राजनीति के लिए प्रत्येक स्तर पर योग्य, जनप्रिय और स्थापित नेतृत्व होना चाहिए, पर नेतृत्व निर्माण के लिए लोकतांत्रिक व संस्थागत स्वरूप तो विकसित करना ही होगा, जिसमें प्रत्येक सदस्य को अपनी योग्यता के अनुसार आगे बढऩे का अवसर हो। नेतृत्व कोई ऐसी शख्सियत नहीं जो रातोंरात बन जाए। उसके लिए पार्टी के पास योग्य, जनप्रिय नेताओं की लंबी लाइन होनी ही चाहिए। कांग्रेस में आज योग्य नेताओं की यह लाइन सिकुड़ रही है, तो पार्टी को इसके कारणों पर चिन्तन करना चाहिए। क्या कांग्रेस इसके लिए कोशिश कर रही है ? कोई भी राष्टï्रीय पार्टी बिना नेतृत्व, संगठन और विचारधारा के कैसे अपनी अस्मिता बचा सकती है?

https://www.youtube.com/watch?v=eYhy5rJZ8DM

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