निर्भया के दोषियों को फांसी के निहितार्थ

सवाल यह है कि क्या निर्भया के दोषियों को मिली फांसी की सजा से समाज में कोई संदेश जाएगा? क्या समाज में बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में कमी आएगी? क्या ऐसे मामलों पर त्वरित न्याय के लिए कानून और इसकी प्रक्रिया में कोई बदलाव लाया जाएगा? क्या सरकार और न्याय व्यवस्था कानून के तमाम छिद्रों को बंद करने की कोशिश करेगी, जिसका फायदा निर्भया के दोषी लगातार उठाते रहे?

Sanjay Sharma
आखिरकार सात साल बाद निर्भया के चारों दोषियों को एक साथ तिहाड़ जेल के भीतर फांसी के फंदे से लटका दिया गया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद निर्भया को देर से ही सही लेकिन इंसाफ मिल गया। लोगों ने इन दरिंदों की फांसी पर अपनी खुशी जाहिर की। निर्भया की मां ने इस दिन को निर्भया दिवस के रूप में मनाने का ऐलान भी किया। सवाल यह है कि क्या निर्भया के दोषियों को मिली फांसी की सजा से समाज में कोई संदेश जाएगा? क्या समाज में बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में कमी आएगी? क्या ऐसे मामलों पर त्वरित न्याय के लिए कानून और इसकी प्रक्रिया में कोई बदलाव लाया जाएगा? क्या सरकार और न्याय व्यवस्था कानून के तमाम छिद्रों को बंद करने की कोशिश करेगी, जिसका फायदा निर्भया के दोषी लगातार उठाते रहे? क्या पीडि़त के अधिकारों पर मंथन किया जाएगा? क्या बिना समाज की सोच बदले महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराधों को कम किया जा सकेगा?
16 दिसंबर 2012 को निर्भया के साथ चलती बस में छह लोगों ने दरिंदगी की। इस दौरान दरिंदों ने उसके दोस्त से मारपीट भी की। बाद में दोनों को चलती बस से फेंक दिया गया। इलाज के लिए निर्भया को सिंगापुर भेजा गया लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका। इस मामले में सभी आरोपियों को पकड़ लिया गया। इसमें एक नाबालिग था। उसे सुधार गृह भेज दिया गया। पांच दोषियों में एक ने खुदकुशी कर ली जबकि लंबे कानूनी लड़ाई के बाद विनय, अक्षय, मुकेश और पवन को फांसी दे दी गई। इस फांसी ने कानूनी और न्यायिक प्रक्रिया की परतें लोगों के सामने खोल दी। कानूनी प्रक्रिया के कमजोर पक्ष का लाभ उठाते हुए दोषियों का वकील कई बार फांसी टलवाने में सफल रहा। इससे साफ है कि ऐसे जघन्य मामलों में कानूनी प्रक्रिया को फुल प्रूफ बनाने की जरूरत है अन्यथा कानूनी विशेषज्ञ इसका लाभ उठाते रहेंगे। इसमें दो राय नहीं की निर्भया के दोषियों को मिली फांसी का समाज पर असर पड़ेगा। अपराधी ऐसा अपराध करने में कई बार सोचेंगे। बावजूद इसके महिलाओं के प्रति अपराधों में कमी तभी आएगी जब समाज की सोच बदलेगी। लिंग-भेद और पुरुषवादी मानसिकता में बदलाव आएगा। इसके लिए खुद समाज को पहल करनी होगी। अभिभावकों को अपने बच्चों को इसकी शिक्षा और संस्कार देने की पहल करनी होगी। खुद स्त्री को भी अपने अधिकारों को लेकर जागरूक होना होगा। इन सबके के अलावा सरकार को भी कानूनों के छिद्रों को बंद करने के अतिरिक्त त्वरित न्याय उपलब्ध कराने की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। त्वरित न्याय से ही अपराधों पर लगाम लगाई जा सकती है।

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