भूगर्भ जल प्रबंधन नीति सरकार और सवाल

सवाल यह है कि क्या सरकारी तंत्र को पूरी तरह सुधारे बिना इस योजना को अमली जामा पहनाया जा सकेगा? क्या यह योजना भ्रष्टïाचार और लापरवाही की भेंट चढऩे से बच पाएगी? क्या नदियों में गिर रहे नालों को रोके बिना भूगर्भ जल को प्रदूषित होने से बचाया जा सकेगा?

Sanjay Sharma
प्रदेश सरकार की कैबिनेट ने भूगर्भ जल प्रबंधन और नियमन अधिनियम को मंजूरी दे दी है। इसके तहत अब यदि कोई व्यक्ति भूगर्भ जल को दूषित करने का दोषी पाया गया तो उसे सात साल की सजा और बीस लाख तक का जुर्माना देना पड़ेगा। वहीं हर भवन में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम जरूरी कर दिया गया है। साथ ही सबमर्सिबल पंप लगाने के लिए भी संबंधित विभाग से मंजूरी लेनी होगी। सवाल यह है कि क्या सरकारी तंत्र को पूरी तरह सुधारे बिना इस योजना को अमली जामा पहनाया जा सकेगा? क्या यह योजना भ्रष्टïाचार और लापरवाही की भेंट चढऩे से बच पाएगी? क्या नदियों में गिर रहे नालों को रोके बिना भूगर्भ जल को प्रदूषित होने से बचाया जा सकेगा? क्या घातक केमिकल युक्त पानी नालों में बहाने वाले कारखानों पर शिकंजा कसा जा सकेगा? क्या कर्मचारियों की मिलीभगत से लगातार हो रहे भूगर्भ जल के दोहन पर नियंत्रण लगाया जा सकेगा?
प्रदेश में लगातार घट रहे भूगर्भ जल को संरक्षित करने और उसे प्रदूषित होने से बचाने के लिए सरकार की यह योजना काफी अच्छी है। बावजूद इसके योजना को जमीनी स्तर पर उतारना बेहद कठिन दिख रहा है। भूमिगत जल के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण कारखानों से निकलने वाला केमिकल युक्त पानी और नदियों में गिरने वाले नाले हैं। लखनऊ में गोमती नदी में बिना शोधन के रोजाना लाखों टन गंदा पानी नालों के जरिए पहुंच रहा है। यहां आज तक सीवर के पानी को शोधित करने के लिए पर्याप्त ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लगाए जा सके हैं। यही नहीं केमिकल युक्त पानी बहाने वाले कारखानों के खिलाफ भी कोई ठोस कार्रवाई होती नहीं दिख रही है। दूसरी ओर खेतों में प्रयोग होने वाले केमिकल भी पानी के जरिए जमीन के नीचे स्थित जल में मिलकर उसे प्रदूषित कर रहे हैं। इन केमिकलों के नुकसान को लेकर किसानों के बीच जागरूकता कार्यक्रम नहीं चलाए जा रहे हैं। जहां तक सबमर्सिबल पंप का सवाल है तो पेयजल की आपूर्ति ठीक नहीं होने के कारण शहरों में इनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। कई शहरों में लोग अपने घरों में सबमर्सिबल पंप के जरिए पानी का कारोबार कर रहे हैं। लखनऊ में ऐसे सैकड़ों कारोबारी गली-मोहल्लों में रहकर अपना धंधा चला रहे हैं। ये जमीन के नीचे से अंधाधुंध पानी का दोहन कर उसे बेचकर मोटी कमाई कर रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि इस पर निगरानी की कोई व्यवस्था आज तक नहीं की जा सकी है। यह सारा खेल कर्मचारियों की मिलीभगत से चल रहा है। जाहिर है, यदि सरकार योजना को अमलीजामा पहनाना चाहती है तो उसे न केवल भूगर्भ जल को प्रदूषित करने वाले तमाम कारकों को खत्म करने के लिए ठोस रणनीति बनानी होगी बल्कि नौकरशाही को भी सक्रिय करना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो स्थितियों में सुधार नहीं हो सकेगा।

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