गंदगी पर हाईकोर्ट की सख्ती के मायने

सवाल यह है कि तमाम दावों के बावजूद शहर में गंदगी का अंबार क्यों लगा रहता है? कूड़े के निस्तारण की समुचित व्यवस्था आज तक क्यों नहीं की जा सकी है? आखिर शहर की सफाई व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए जारी होने वाला भारी भरकम बजट कहां खर्च किया जा रहा है? कोर्ट के आदेशों का पालन करने में कोताही क्यों बरती जा रही है?

Sanjay Sharma

हाईकोर्ट की लखनऊ खंड पीठ ने प्रदेश की राजधानी लखनऊ में फैली गंदगी पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने नगर निगम के अफसरों से दो टूक कहा है कि यदि खुले स्थानों पर कूड़ा और शहर में आवारा जानवर घूमते मिले तो इसे गंभीरता से लिया जाएगा। सवाल यह है कि तमाम दावों के बावजूद शहर में गंदगी का अंबार क्यों लगा रहता है? कूड़े के निस्तारण की समुचित व्यवस्था आज तक क्यों नहीं की जा सकी है? आखिर शहर की सफाई व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए जारी होने वाला भारी भरकम बजट कहां खर्च किया जा रहा है? कोर्ट के आदेशों का पालन करने में कोताही क्यों बरती जा रही है? सफाई के लिए तैनात सफाई कर्मी क्या कर रहे हैं? क्या सरकार इस मामले में गंभीर नहीं है? क्या ऐसे ही राजधानी को स्मार्ट बनाने का सपना साकार होगा?
हाईकोर्ट ने साफ सफाई को लेकर पहली बार अफसरों को नहीं फटकारा है। इसके पहले भी वह आवारा पशुओं की धर-पकड़ और सफाई व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए कह चुकी है। बावजूद इसके अधिकारियों पर कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा है। शहर को चमकाने की जिम्मेदारी नगर निगम के पास है। इसके लिए उसके पास न केवल सफाईकर्मियों का भारी भरकम अमला है बल्कि इसकी निगरानी के लिए अफसरों की फौज भी है। हकीकत यह है कि राजधानी में कूड़ा उठान और निस्तारण की व्यवस्था पूरी तरह चौपट है। बाजारों, सडक़ों और गलियों में गंदगी बिखरी पड़ी है। डोर-टू-डोर कूड़ा उठान नहीं होने से लोग खाली प्लाटों में कूड़ा फेंक रहे हैं। इससे लोगों के संक्रमित होने का खतरा बना हुआ है। यही नहीं कई बार सफाईकर्मी कूड़े को खुले में ही जलाकर निस्तारित कर देते हैं। इससे वातावरण प्रदूषित हो रहा है। वहीं कोर्ट के आदेश के बावजूद आज भी शहर की सीमा पर तमाम डेयरियां संचालित की जा रही हैं। इन डेयरियों के जानवर सडक़ों पर घूमते नजर आते हैं। इसके कारण सडक़ पर हादसों का खतरा बढ़ गया है। वहीं नगर निगम जानवरों की धर-पकड़ के लिए कभी-कभी अभियान चलाकर खानापूर्ति करता है। कूड़ा निस्तारण की आज तक समुचित व्यवस्था नहीं की जा सकी है। लिहाजा निस्तारण प्लांटों के पास कूड़े का पहाड़ खड़ा हो गया है। पुराने शहर का हाल और भी खराब है। यहां हल्की बारिश में ही नालियों और सीवर का गंदा पानी सडक़ों पर बहने लगता है और लोगों को आवाजाही में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। जाहिर है यदि सरकार राजधानी को स्वच्छ रखना चाहती है तो उसे हाईकोर्ट के आदेशों को जमीन पर उतारना होगा। साथ ही लापरवाह अधिकारियों और कर्मियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी होगी।

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