जड़ें जमाते साइबर अपराधी और पस्त पुलिस

सवाल यह है कि साइबर अपराधियों पर पुलिस शिकंजा कसने में नाकाम क्यों साबित हो रही है? क्या बढ़ते इंटरनेट के प्रयोग ने साइबर अपराधियों की पहुंच घर तक कर दी है? आखिर साइबर सेल क्या कर रहा है? क्या लोगों को जागरूक किए बिना इन अपराधों पर लगाम लगाई जा सकती है? क्या पुलिस हाईटेक अपराधियों से दो-दो हाथ करने में सक्षम नहीं है?

Sanjay Sharma
प्रदेश में साइबर क्राइम का ग्राफ साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है। तमाम दावों के बावजूद पुलिस इन पर नकेल कसने में नाकाम है। इन अपराधों में खातों से पैसा उड़ाने से लेकर कंप्यूटर हैक कर गोपनीय जानकारियां चुराने तक के मामले शामिल हैं। सवाल यह है कि साइबर अपराधियों पर पुलिस शिकंजा कसने में नाकाम क्यों साबित हो रही है? क्या बढ़ते इंटरनेट के प्रयोग ने साइबर अपराधियों की पहुंच घर तक कर दी है? आखिर साइबर सेल क्या कर रहा है? क्या लोगों को जागरूक किए बिना इन अपराधों पर लगाम लगाई जा सकती है? क्या पुलिस हाईटेक अपराधियों से दो-दो हाथ करने में सक्षम नहीं है? क्या ऐसे अपराधों से अपने नागरिकों को बचाने के लिए सरकार गंभीर नहीं है? क्या पुलिस की पहुंच से दूर होने के चलते अपराधियों के हौसले बुलंद हैं?
इंटरनेट के युग ने दुनिया में एक नए तरह के साइबर अपराध को जन्म दिया है। इसके जरिए अपराधी कहीं से भी लोगों को अपना निशाना बना सकता है। उसकी पहुंच लोगों के घरों तक हो चुकी है। उत्तर प्रदेश में भी साइबर अपराधी अपनी जड़ें जमाते जा रहे हैं। यहां हर साल दस फीसदी की दर से साइबर अपराध बढ़ रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़ें चौंकाने वाले हैं। अकेले राजधानी लखनऊ में पिछले दो सालों में साइबर अपराध की घटनाओं में 33.3 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। गाजियाबाद में तीन गुना और कानपुर में इससे अधिक साइबर अपराध की घटनाएं दर्ज की गई हैं। दरअसल, साइबर अपराधी लोगों को झांसा देकर अपराधों को अंजाम देते हैं। वे एटीएम का क्लोन बनाकर लोगों को लूट रहे हैं। इसके अलावा लोगों के कंप्यूटर में सेंधमारी कर जरूरी जानकारियां चुराई जा रही हैं। ये डेटा ऊंचे दामों पर बिकते हैं। आंकड़ों के मुताबिक 2018 में कानपुर में 204, गाजियाबाद में 191 और लखनऊ में 898 मामले कंप्यूटर में सेंधमारी के दर्ज किए गए हैं। वहीं पुलिस इन साइबर अपराधियों के सामने पस्त नजर आती है। साइबर सेल शो पीस बने हुए हैं। यहां पर नियुक्त पुलिसकर्मियों को इंटरनेट का हाईटेक ज्ञान नहीं है। इसके अलावा पीडि़त को साइबर अपराधियों के बारे में कोई जानकारी नहीं होती है। ऐसी स्थिति में पुलिस इनको खोज पाने में अक्सर असफल रहती है और वह मामले पर केस दर्ज कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती है। यदि सरकार प्रदेश में बढ़ते साइबर अपराधों को नियंत्रित करना चाहती है तो उसे साइबर सेल को हाईटेक बनाना होगा। साइबर अपराधियों से निपटने के लिए पुलिसकर्मियों को प्रशिक्षित करना होगा। इसके अलावा उसे साइबर अपराध के प्रति लोगों को जागरूक भी करना होगा।

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