गरीबों के लिए मुसीबत बनी ठंड

यूपी की राजधानी लखनऊ में भी न्यूनतम तापमान औसत से काफी नीचे 4 डिग्री सेल्सियस तक चला गया है। इसी के साथ कोहरे की मार भी पड़ रही है। जो कि गरीबों के लिए मुसीबत बनती जा रही है। वहीं तेज ठंड में मरीजों खासतौर से बुजुर्गों और बच्चों की हालत बिगड़ती जा रही है।

Sanjay sharma
उत्तर भारत कड़ाके की ठंड से ठिठुर रहा है। सर्दी के पुराने रिकार्ड टूट रहे हैं और नए बन रहे हैं। कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के ज्यादातर इलाकों में तापमान शून्य से भी नीचे बना हुआ है। यहां पानी बर्फ होने लगा है। नदी-नाले जम गए हैं। मैदानी इलाकों में भी कई जगह पारा शून्य से नीचे है। राजस्थान के कई हिस्सों में तापमान शून्य के करीब पहुंचने से पानी जमने लगा है। उत्तर भारत के ज्यादातर मैदानी इलाकों का तापमान शिमला से भी कम हो गया है। यूपी की राजधानी लखनऊ में भी न्यूनतम तापमान औसत से काफी नीचे 4 डिग्री सेल्सियस तक चला गया है। इसी के साथ कोहरे की मार भी पड़ रही है। जो कि गरीबों के लिए मुसीबत बनती जा रही है। वहीं तेज ठंड में मरीजों खासतौर से बुजुर्गों और बच्चों की हालत बिगड़ती जा रही है। अस्पतालों में मरीजों की भीड़ बढऩे लगती है। सर्दी से होने वाली मौतों के आंकड़े भी बढ़ रहे हैं, लेकिन सरकार ठंड से हुई मौतों को मानने से इनकार कर रही है।
अंधाधुंन पेड़ों की कटान होने और प्रदूषण बढऩे के कारण ठंड की अवधि और तीव्रता दोनों में बदलाव आया है। हर साल सर्दी किसी न किसी रूप में पिछले रिकार्ड को तोड़ रही है। करीब तीन दशक पहले तक तो सर्दी की अवधि औसतन चार से पांच महीने रहती थी। जबकि अब सर्दी कुछ दिन ही पड़ती है, लेकिन पहले की तुलना में कहीं ज्यादा मारक हो गई है। ऐसे में आमजनता और सरकार दोनों को मिलकर ग्लोबल वार्मिंग से होने वाले खतरों को कम करने की दिशा में ठोस कदम उठाना होगा। हमें पेड़ों को बचाने, पौधे लगाने, जल संरक्षण करने, नदियों व तालाबों को बचाने के साथ-साथ कार्बन उत्सर्जन की मात्रा को भी कम करना होगा। एयर कंडीशन, फ्रिज, पेट्रोल और डीजल से चलने वाली गाडिय़ों के साथ-साथ प्रदूषण फैलाने वाले उपकरणों का इस्तेमाल कम से कम करना होगा। इसके अलावा ठंड में होने वाली बीमारियों को ध्यान में रखकर अस्पतालों में दवाओं, जांच व बेड की सुविधाओं का समुचित प्रबंध करना होगा। गरीबों के लिए रैन बसेरों के साथ-साथ खाने के लिए भी कुछ इंतजाम करने होंगे ताकि गरीबों में बीमारियों व भयंकर ठंड से लडऩे की ताकत भी बची रहे। इसमें सरकार चाहे तो स्वयंसेवी संगठनों व प्राइवेट संस्थाओं से भी मदद ले सकती है। वहीं समाज के सक्षम लोग भी ठंड से परेशान गरीबों की खाना देकर, गर्म कपड़े या विस्तर उपलब्ध करवा कर उन्हें ठंड से बचाने में अपना योगदान दे सकते हैं। यदि ऐसा हो सका तो हम स्वच्छ वातावरण के साथ-साथ बेहतर समाज का निर्माण करने में भी सफल होंगे।

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