बिगड़ती मानसिक सेहत खतरे की घंटी

सवाल यह है कि नागरिकों की बिगड़ती मानसिक सेहत की वजहें क्या हैं? क्या आपाधापी की जिंदगी ने लोगों को बीमार कर दिया है? क्या एकल परिवारों का चलन इसके लिए जिम्मेदार है? क्या मानसिक रूप से बीमार लोग देश का विकास कर सकेंगे? क्या लगातार बढ़ते मनोरोगी सरकार के खजाने पर अतिरिक्त बोझ नहीं डाल रहे हैं?

sanjay Sharma
लॉसेट जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट बेहद चिंताजनक है। इसके मुताबिक हर सात में एक भारतीय मनोविकारों का शिकार है और इसमें साल-दर-साल इजाफा हो रहा है। सवाल यह है कि नागरिकों की बिगड़ती मानसिक सेहत की वजहें क्या हैं? क्या आपाधापी की जिंदगी ने लोगों को बीमार कर दिया है? क्या एकल परिवारों का चलन इसके लिए जिम्मेदार है? क्या मानसिक रूप से बीमार लोग देश का विकास कर सकेंगे? क्या लगातार बढ़ते मनोरोगी सरकार के खजाने पर अतिरिक्त बोझ नहीं डाल रहे हैं? क्या इससे निपटने के लिए समाज को गंभीरता से सोचने की जरूरत नहीं है? क्या ये मनोविकार खुदकुशी जैसे मामलों में इजाफा नहीं कर रहे हैं? क्या जीवन प्रणाली में बदलाव किए बिना मनोविकारों को नियंत्रित किया जा सकता है?
औद्योगिककरण से उपजे शहरीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया है। बुनियादी सुविधाओं के साथ शहर रोजगार, शिक्षा व चिकित्सा संस्थानों के प्रमुख केंद्र बन गए। उत्पादन और वितरण की धुरी शहरों के इर्द-गिर्द घूम रही है। शहरीकरण के इस दौर में गांव उपेक्षित हो गए हैं। आर्थिक रूप से स्वावलंबी गांव छिन्न-भिन्न हो गए। यहां से लोग रोजगार, शिक्षा और अन्य सुविधाओं के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। इसका सबसे खराब असर संयुक्त परिवारों पर पड़ा। ये छिन्न-भिन्न हो गए। शहरों ने एकल परिवार को प्रोत्साहित किया। इस एकल परिवार में पति-पत्नी और बच्चों को जगह मिली। शहरों में बढ़ती आबादी के सापेक्ष रोजगार साधन विकसित नहीं हुए। लिहाजा शोषण भी बढ़ा। इसके अलावा बेहतर परफार्मेंस दिखाने का दबाव भी बढ़ा है। नए आर्थिक ढांचे और सूचना क्रांति ने एक नये प्रकार की जीवन प्रणाली को जन्म दिया। आपाधापी की जिंदगी ने तनाव को जन्म दिया। एकल परिवार के कारण लोग एकाकी पड़ गए। उनके तनाव और समस्याओं को सुनने-समझने वाला कोई नहीं रहा। इसका सीधा असर लोगों की मानसिक सेहत पर पड़ रहा है। लोगों में अवसाद, बेचैनी, सिजोफ्रेनिया जैसे मनोविकार बढऩे लगे। इन मनोविकारों के कारण लोगों में खुदकुशी जैसे घातक प्रवृत्ति भी उत्पन्न हुई। इन मनोरोगियों के इलाज में सरकार को हर साल काफी धनराशि खर्च करनी पड़ रही है। जाहिर है मनोरोगियों का देश के विकास पर नकरात्मक असर पड़ रहा है। यदि सरकार मनोरोगियों की संख्या को कम करना चाहती है तो उसे शहरों के साथ गांव केंद्रित अर्थव्यवस्था पर भी फोकस करना होगा। इसके अलावा समाज को भी इसे रोकने के लिए आगे आना पड़ेगा वरना ये मनोविकार एक दिन पूरे देश को अपनी चपेट में ले लेंगे।

Loading...
Pin It

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Time limit is exhausted. Please reload the CAPTCHA.