लचर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जिम्मेदार कौन?

सवाल यह है कि क्या राजधानी के नामचीन सरकारी अस्पताल गंभीर रोगियों का इलाज करने में अक्षम हैं? क्या इन अस्पतालों में बेहतर चिकित्सक और सुविधाओं का अभाव है? हर साल अरबों का बजट आखिर कहां खर्च हो रहा है? लचर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या सरकार को इस पूरे तंत्र में बदलाव की जरूरत महसूस नहीं होती है? रेफर-रेफर का खेल कब तक चलता रहेगा?

Sanjay sharma

बुरी तरह से झुलसी उन्नाव गैंगरेप पीडि़ता को लखनऊ में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं उपलब्ध हो सकीं। उसे नाजुक हालत में मजबूरन यहां से दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में रेफर करना पड़ा। यहां के चिकित्सकों ने असुविधाओं और बेहतर इलाज न उपलब्ध हो पाने का हवाला देकर उसे दूसरे अस्पताल रेफर कर दिया। सवाल यह है कि क्या राजधानी के नामचीन सरकारी अस्पताल गंभीर रोगियों का इलाज करने में अक्षम हैं? क्या इन अस्पतालों में बेहतर चिकित्सक और सुविधाओं का अभाव है? हर साल अरबों का बजट आखिर कहां खर्च हो रहा है? लचर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या सरकार को इस पूरे तंत्र में बदलाव की जरूरत महसूस नहीं होती है? रेफर-रेफर का खेल कब तक चलता रहेगा? क्या जनता को बेहतर इलाज उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है?
पूरे प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह चरमरा चुकी है। राजधानी लखनऊ की भी हालत कोई कम खराब नहीं है। यह स्थिति तब है जब यहां केजीएमयू, पीजीआई और लोहिया संस्थान जैसे नामचीन अस्पताल हैं। अधिकांश अस्पतालों में बर्न यूनिट तक नहीं है। लिहाजा आग से जले मरीज का इलाज कराना बेहद मुश्किल है। इसके अलावा अन्य गंभीर रोगियों को भी इलाज ठीक तरीके से नहीं मिल पाता है। किडनी के रोगियों को डायलिसिस कराने के लिए महीनों पहले डेट लेनी पड़ती है। कैंसर पेशेंट को कीमो और रेडियोथेरपी कराने में पसीने छूट जाते हैं। ऑपरेशन के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता है। यही नहीं सामान्य मरीजों को भी दवा से लेकर जांच कराने के लिए अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। जन औषधि केंद्र से लेकर अस्पतालों में बने मेडिकल स्टोर्स तक में दवाओं का टोटा पड़ा रहता है। मरीजों को पर्याप्त दवाएं नहीं मिल पाती हैं। लापरवाही का आलम यह है कि अधिकांश अस्पतालों में न तो समय से चिकित्सक उपलब्ध होते हैं न ही पर्चा बनाने वाले कर्मचारी ही मौजूद रहते हैं। कई अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों का टोटा पड़ा है। अकेले केजीएमयू में दो सौ से अधिक चिकित्सकों के पद रिक्त है। यहां के करीब पांच विभागों में एक भी चिकित्सक शिक्षक नहीं है। यही नहीं मरीजों को अधोमानक दवाएं तक उपलब्ध करा दी जाती हैं। यह हाल तब है जब हर साल अरबो रुपये का बजट सरकार जारी करती है। जाहिर है यदि सरकार आम जनता को गुणवत्ता युक्त चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराना चाहती है तो उसे सबसे पहले इन संस्थानों में योग्य चिकित्सकों की नियुक्ति करनी होगी। साथ ही अन्य जरूरी संसाधन मुहैया कराने होंगे।

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