अर्थव्यवस्था में जारी सुस्ती के निहितार्थ

सवाल यह है कि जीडीपी में लगातार हो रही गिरावट का देश की अर्थव्यवस्था पर कितना असर पड़ेगा? क्या सरकार आर्थिक विकास दर को बढ़ाने में नाकाम साबित हो रही है? क्या इससे महंगाई और बेरोजगारी की समस्या भयानक रूप से बढ़ जाएगी? क्या इसका असर जनता की क्रय शक्ति पर नहीं पड़ेगा? क्या इससे निपटने के लिए सरकार को ठोस रणनीति बनाने की जरूरत नहीं है?.

Sanjay Sharma

भारत की अर्थव्यवस्था में सुस्ती जारी है। चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में जीडीपी यानी आर्थिक विकास दर 4.5 फीसदी पर पहुंच गई है। यह छह साल में किसी एक तिमाही की सबसे बड़ी गिरावट है। इससे पहले मार्च 2013 में देश की जीडीपी दर इस स्तर पर पहुंची थी। पहली तिमाही में जीडीपी पांच फीसदी पर थी। इस लिहाज से तीन महीने के भीतर इसमें 0.5 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। सवाल यह है कि जीडीपी में लगातार हो रही गिरावट का देश की अर्थव्यवस्था पर कितना असर पड़ेगा? क्या सरकार आर्थिक विकास दर को बढ़ाने में नाकाम साबित हो रही है? क्या इससे महंगाई और बेरोजगारी की समस्या भयानक रूप से बढ़ जाएगी? क्या इसका असर जनता की क्रय शक्ति पर नहीं पड़ेगा? क्या इससे निपटने के लिए सरकार को ठोस रणनीति बनाने की जरूरत नहीं है?
जीडीपी दर किसी भी देश की अर्थव्यवस्था और उसकी दिशा को बताती है। भारत में जीडीपी आंकड़ों की गणना हर तीसरे महीने यानी तिमाही के आधार पर होती है। ये आंकड़े कृषि, खनन, मैन्युफैक्चरिंग, बिजली, कंस्ट्रक्शन, व्यापार, रक्षा और सेवा क्षेत्र से लिए जाते हैं। इन्हें कोर सेक्टर कहते हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक एक साल पहले के मुकाबले इस कोर सेक्टर में 5.8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी। ताजा आंकड़ों से साफ है कि सरकार के तमाम दावों के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था सुस्त होती जा रही है। आर्थिक विकास की रफ्तार में आई इस गिरावट का सीधा असर आम आदमी पर पड़ेगा। विभिन्न क्षेत्रों में आई गिरावट के कारण मांग और आपूर्ति में असंतुलन उत्पन्न हो जाएगा। उद्योग धंधों में उत्पादन घटेगा। लिहाजा कंपनियां घाटे की भरपाई के लिए कर्मचारियों की छंटनी करेगी। इससे देश में बेरोजगारी और बढ़ेगी। विकास दर में सुस्ती के चलते अन्य क्षेत्रों में भी रोजगार के अवसर नहीं उत्पन्न हो सकेंगे। आमदनी कम होने से लोगों की क्रय शक्ति प्रभावित होगी। खरीदारी कम होने से उत्पादन भी घटेगा। इसके कारण कई छोटी और मध्यम कंपनियां बंद होने की कगार पर पहुंच सकती हैं। छोटे कारोबारियों की आय भी प्रभावित होगी। लिहाजा बाजार में महंगाई भयानक रूप ले लेगी। आय में आई कमी के कारण लोगों में बचत और निवेश की प्रवृत्ति भी कम हो जाएगी। इस सबका खराब असर अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। जाहिर है यदि सरकार आर्थिक सुस्ती से निपटना चाहती है तो उसे कोर सेक्टर को आगे बढ़ाने के लिए पैकेज की घोषणा करनी होगी। इसके अलावा दूसरे क्षेत्रों में भी रोजगार के साधन उपलब्ध कराने की कोशिश करनी होगी। यदि अर्थव्यवस्था में सुधार नहीं हुआ तो देश मंदी की चपेट में आ जाएगा।

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