सवालों के घेरे में सरकारी शिक्षा

सवाल यह है कि जब शिक्षकों को ही विषय का ज्ञान नहीं है तो बच्चों के शिक्षा का स्तर कैसे बेहतर होगा? क्या ऐसे ही शिक्षकों के भरोसे सरकार गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने का दावा कर रही है? क्या बच्चों के भविष्य को नष्टï करने का अधिकार किसी को दिया जा सकता है? सरकारी शिक्षा में आई गिरावट के लिए कौन जिम्मेदार है?

Sanjay sharma

प्रतापगढ़ के एक पूर्व माध्यमिक विद्यालय के हेडमास्टर और सहायक अध्यापक डीएम के सामान्य सवालों का जवाब नहीं दे सके। जांच में वहां पढ़ रहे छात्रों का शैक्षणिक स्तर भी बेहद निम्न स्तर का मिला। यह सरकारी शिक्षा की बानगी भर है। यह हाल प्रदेश के तमाम सरकारी स्कूलों का है। सवाल यह है कि जब शिक्षकों को ही विषय का ज्ञान नहीं है तो बच्चों के शिक्षा का स्तर कैसे बेहतर होगा? क्या ऐसे ही शिक्षकों के भरोसे सरकार गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने का दावा कर रही है? क्या बच्चों के भविष्य को नष्टï करने का अधिकार किसी को दिया जा सकता है? सरकारी शिक्षा में आई गिरावट के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या शिक्षकों की मानीटरिंग करने की जरूरत नहीं है? क्या ऐसे ही नकलविहिन परीक्षा संभव होगी? क्या पूरे तंत्र को बदले बिना स्थितियों में सुधार संभव है?
प्रतापगढ़ ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश की सरकारी शिक्षा ध्वस्त होती जा रही है। प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक विद्यालयों की हालत सबसे खराब है। अधिकांशत: स्कूलों के बच्चों का शैक्षणिक स्तर खराब है। यही नहीं ये स्कूल बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। कुछ स्कूलों में छात्रों के सापेक्ष अधिक तो कुछ में बेहद कम शिक्षक हैं। इसके अलावा बच्चों के बैठने और खेलने तक की व्यवस्था नहीं है। छात्रों को समय पर ड्रेस और किताबें नहीं मिल पाती हैं। कई स्कूल जर्जर भवनों में संचालित हो रहे हैं। तमाम स्कूलों में शिक्षक अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन नहीं कर रहे हैं। वे छात्रों को नियमित रूप से पढ़ाने से कतराते हैं। कई बार शिक्षक कुछ पैसे देकर अपनी जगह दूसरे व्यक्ति को पढ़ाने के लिए नियुक्त कर देते हैं। ऐसे कई मामले सामने भी आ चुके हैं। इसके अलावा शिक्षकों को चुनाव समेत दूसरे कार्यों में लगा दिया जाता है, जिससे भी छात्रों की पढ़ाई बाधित होती है। हैरानी की बात यह है कि इन स्कूलों का नियमित निरीक्षण तक नहीं किया जाता है। शिकायतों के बाद भी नौकरशाह हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं। इसके कारण स्थितियां लगातार बिगड़ती जा रही हैं। शिक्षा के गिरते स्तर के कारण ही आम आदमी का मोह सरकारी शिक्षण संस्थाओं से भंग होता जा रहा है। वे अपने बच्चों को अधिक फीस देकर निजी स्कूलों में पढ़ाने को मजबूर हैं। जाहिर है कि यदि सरकार शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त और गुणवत्तायुक्त बनाना चाहती है तो उसे प्रशिक्षित और योग्य शिक्षकों की नियुक्ति करनी होगी। साथ ही इन नियुक्तियों में होने वाले भ्रष्टïाचार पर भी अंकुश लगाना होगा। इसके अलावा शिक्षकों की योग्यता की समय-समय पर मानीटरिंग करनी होगी। यदि ऐसा नहीं हुआ तो सरकारी शिक्षा व्यवस्था एक दिन पूरी तरह धराशायी हो जाएगी।

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