जलवायु परिवर्तन और भारत की मुश्किलें

सवाल यह है कि क्या जलवायु परिवर्तन को रोका नहीं जा सकता है? क्या भारत के साथ दुनिया के तमाम देशों को इसके लिए पहल करनी होगी? क्या निकट भविष्य में भारत में महंगाई और बढ़ेगी? क्या बच्चों को कुपोषण से बचाने का अभियान सफल हो पाएगा? क्या बढ़ते तापमान के कारण जंगलों का सफाया हो जाएगा? क्या क्लीन एनर्जी के बिना इसे रोका जा सकेगा?

Sanjay Sharma

जलवायु परिवर्तन पर लैंसेट की ताजा रिपोर्ट चिंतित करने वाली है। रिपोर्ट के मुताबिक बढ़ते तापमान का भारत पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। इसका असर न केवल फसलों के उत्पादन बल्कि रोगों के विस्तार पर भी दिख रहा है। फसलों के उत्पादन में दो फीसदी की गिरावट आई है तो संक्रामक बीमारियां तेजी से बढ़ी हैं। सवाल यह है कि क्या जलवायु परिवर्तन को रोका नहीं जा सकता है? क्या भारत के साथ दुनिया के तमाम देशों को इसके लिए पहल करनी होगी? क्या निकट भविष्य में भारत में महंगाई और बढ़ेगी? क्या बच्चों को कुपोषण से बचाने का अभियान सफल हो पाएगा? क्या बढ़ते तापमान के कारण जंगलों का सफाया हो जाएगा? क्या क्लीन एनर्जी के बिना इसे रोका जा सकेगा? क्या आने वाली पीढ़ी को अकाल और पानी की कमी का सामना करना पड़ेगा?
पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन से जूझ रही है। इसका असर भारत पर भी पड़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साठ सालों के भीतर चावल और मक्के के औसत उत्पादन में दो फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। अन्य फसलों पर भी असर पड़ रहा है। तापमान बढऩे से कई प्रकार के वैक्टीरिया सक्रिय हो गए हैं। तीन फीसदी की दर से डायरिया के केस बढ़े हैं। लोगों के काम के घंटे प्रभावित हो रहे है। जंगलों में आग लगने की घटनाओं में इजाफा हुआ है। वर्ष 2001-4 के बीच दो करोड़ दस लाख लोग जंगलों में लगी आग से प्रभावित हुए हैं। इसमें दो राय नहीं कि यदि यही स्थिति रही तो आने वाले दिनों में जनसंख्या के अनुपात में खाद्यान्न उत्पादन बेहद क म हो जाएगा। इसका असर महंगाई पर पड़ेगा। इससे गरीब बच्चों में कुपोषण समेत अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं उत्पन्न होगी। पेड़ों की कमी के कारण कम बारिश की समस्या उत्पन्न होगी। इससे भूगर्भ जल रिचार्ज नहीं हो सकेगा। कई नदियां सूख जाएंगी और पेयजल की किल्लत उत्पन्न हो जाएगी। हाल में 130 देशों के वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि जलवायु परिवर्तन को रोका नहीं गया तो आने वाले दिनों में आर्कटिक में मौजूद सबसे पुराना आइसबर्ग खत्म हो जाएगा। यह 2030 तक पूरी तरह पिघल जाएगा। इससे समुद्र का जलस्तर बढ़ जाएगा और कई शहरों के समुद्र में डूबने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा। यहां रहने वाले जीव-जंतुओं की प्रजाति हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। जाहिर है जलवायु परिवर्तन के खतरे को रोकने के लिए सभी देशों को साझा कार्यक्रम बनाकर चलना होगा और तापमान को कम करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। जहां तक भारत का सवाल है तो उसे वृक्षारोपण जल संरक्षण और सोलर एनर्जी के प्रयोग को बढ़ावा देना होगा वरना भारत को इस मुसीबत से दो-चार होना पड़ेगा।

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