सूचना का अधिकार और सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश की उन सभी संस्थाओं को प्रभावित करेगा जो सूचना अधिकार के तहत जानकारियां उपलब्ध कराने में आनाकानी करती हैं। यह उन सियासी दलों के लिए भी एक सबक की तरह होगा जो सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर अपनी सियासी रोटियां सेंकने के लिए अंगुली उठाते रहते हैं।

sanjay Sharma

अब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया का दफ्तर भी सूचना अधिकार कानून के दायरे में आ गया है। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने इस पर अपनी मुहर लगा दी है। हालांकि कोर्ट ने आगाह किया है कि इसका इस्तेमाल निगरानी रखने के हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता है और पारदर्शिता के मुद्दे पर विचार करते समय न्यायपालिका की स्वतंत्रता का ध्यान रखना होगा। निजता का अधिकार एक अहम पहलू है और चीफ जस्टिस दफ्तर से जानकारी देने के बारे में निर्णय लेते समय इसमें व पारदर्शिता के बीच संतुलन कायम करना होगा। सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के मायने क्या हैं? क्या इससे अदालतों में अब न्यायिक स्वतंत्रता और पारदर्शिता का नया युग शुरू होगा? क्या इसे कोर्ट की निगरानी का हथियार बनाने की कोशिश की जा सकती है? इस फैसले का देश की अन्य संस्थाओं पर क्या असर पड़ेगा? क्या नयी व्यवस्था से जनता के मन में सुप्रीम कोर्ट के प्रति विश्वास और मजबूत होगा?
दरअसल, चीफ जस्टिस दफ्तर को सूचना अधिकार कानून के दायरे में लाने का मामला सुभाष चंद्र अग्रवाल ने उठाया था। केन्द्रीय सूचना आयोग ने अग्रवाल के आवेदन पर जब जनवरी 2008 में उच्चतम न्यायालय को अपेक्षित जानकारी उपलब्ध कराने को कहा तो इसके खिलाफ हाईकोर्ट में मामला पहुंचा। हाईकोर्ट ने 10 जनवरी, 2010 को अपने फैसले में कहा कि चीफ जस्टिस का दफ्तर सूचना अधिकार कानून के दायरे में आता है और न्यायिक स्वतंत्रता किसी जज का विशेषाधिकार नहीं बल्कि उन्हें इसकी जिम्मेदारी सौंपी गयी है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले को बरकरार रखा है। कोर्ट ने स्वीकार किया कि चीफ जस्टिस का दफ्तर पब्लिक अथॉरिटी है और इस दलील को खारिज कर दिया कि चीफ जस्टिस दफ्तर के सूचना अधिकार दायरे में आने से न्यायिक स्वतंत्रता प्रभावित होगी। हालांकि कोर्ट ने पारदर्शिता व न्यायिक स्वतंत्रता में संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया। इसमें दो राय नहीं कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश की उन सभी संस्थाओं को प्रभावित करेगा जो सूचना अधिकार के तहत जानकारियां उपलब्ध कराने में आनाकानी करती हैं। यह उन सियासी दलों के लिए भी एक सबक की तरह होगा जो सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर अपनी सियासी रोटियां सेंकने के लिए अंगुली उठाते रहते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि संविधान के संरक्षक सुप्रीम कोर्ट ने आईने की तरह साफ कर दिया है कि वह भी नियम-कानून से परे नहीं है। निष्पक्षता, न्यायिक स्वतंत्रता और पारदर्शिता उसके मूल में है। इस फैसले से आम जनता के मन में सुप्रीम कोर्ट और उसकी न्यायिक प्रक्रिया के प्रति विश्वास और दृढ़ होगा।

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