बीमार होते शहर और लचर तंत्र

सवाल यह है कि शहरों में फैली इस अव्यवस्था के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या लचर तंत्र ने शहरों को नर्क में तब्दील कर दिया है? ये रोगों के अड्डे क्यों बनते जा रहे हैं? डेंगू और स्वाइन फ्लू का दायरा बढ़ता क्यों जा रहा है? प्रदूषण पर लगाम क्यों नहीं लग पा रही है? हर साल करोड़ों खर्च करने के बाद भी गंदगी क्यों फैली है? यातायात दुरुस्त क्यों नहीं है?

Sanjay sharma

प्रदेश के तमाम शहर अव्यवस्थाओं के शिकार हो चुके हैं। यहां गंदगी है। प्रदूषण है। सडक़ों पर घूमते आवारा जानवर हैं। प्रदूषित नदियां हैं। कुल मिलाकर तमाम बुनियादी सुविधाएं यहां दम तोड़ रही हैं। सरकार के तमाम दावों के बावजूद स्थितियों में कहीं कोई बदलाव नहीं नजर आ रहा है। लिहाजा लोग घुट-घुटकर जीने को मजबूर हैं। सवाल यह है कि शहरों में फैली इस अव्यवस्था के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या लचर तंत्र ने शहरों को नर्क में तब्दील कर दिया है? ये रोगों के अड्डे क्यों बनते जा रहे हैं? डेंगू और स्वाइन फ्लू का दायरा बढ़ता क्यों जा रहा है? प्रदूषण पर लगाम क्यों नहीं लग पा रही है? हर साल करोड़ों खर्च करने के बाद भी गंदगी क्यों फैली है? यातायात दुरुस्त क्यों नहीं है? विकास के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई क्यों हो रही है? क्या ऐसे ही प्रदेश के तमाम शहरों को स्मार्ट बनाने का सपना साकार होगा?
शहरीकरण विकास का प्रतीक है। आम आदमी के लिए शहर मूलभूत सुविधाओं, रोजगार, बेहतर चिकित्सा, शिक्षा और बाजार का केंद्र होते हैं लेकिन ये प्रतीक बीमार होते जा रहे हैं। यूपी के अधिकांश शहरों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। यहां कभी पानी तो कभी बिजली की किल्लत रहती है। सरकारी अस्पतालों का हाल-बेहाल है। अधिकांश अस्पतालों में चिकित्सकों, दवाओं और बेहतर जांच सुविधाओं का अभाव है। प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र शो पीस बनकर रह गए हैं। गंभीर रोगियों का इलाज कराना मुश्किल होता जा रहा है। बाजार से लेकर गलियों तक में गंदगी रहती है। नालियां बजबजाती रहती हैं। सीवर चोक मिलते हैं। यह हाल तब है जब हर साल अरबों रुपये साफ-सफाई पर खर्च किए जाते हैं और इसके लिए भारी भरकम अमला है। सडक़ों के गड्ढे हादसों को न्योता दे रहे हैं। यातायात व्यवस्था चरमरा चुकी है। जाम के कारण सडक़ों पर सांस लेना मुश्किल हो चुका है। प्रदूषण के कारण स्थितियां बिगड़ती जा रही है। प्रदूषण फैलाने वाले कारकों को खत्म करने की कोई कोशिश होती नहीं दिख रही है। लिहाजा हर साल विभिन्न रोगों और हादसों से तमाम लोग असमय काल के गाल में समा रहे हैं। अकेले प्रदेश की राजधानी लखनऊ में डेंगू से इस साल कई लोगों की जान जा चुकी है। एक हजार से अधिक लोग इसकी चपेट में आ चुके हैं। जाहिर है यदि सरकार शहरों को स्मार्ट बनाने का सपना साकार करना चाहती है तो उसे बीमार होते शहरों का समय रहते इलाज करना होगा। इसके लिए तंत्र को जवाबदेह बनाना होगा और लापरवाही करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी होगी अन्यथा एक समय ये शहर पूरी तरह न रहने योग्य घोषित हो जाएंगे।

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