प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के अर्थ

सवाल यह है कि बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट को सख्त आदेश क्यों देने पड़े? क्या राज्य सरकारें प्रदूषण को लेकर गंभीर नहीं है? क्या लोगों के जीवन की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की नहीं है? क्या प्रदूषण को खत्म करना नामुमकिन है? सत्ताधारी पार्टियां इस पर सियासत क्यों कर रही हैं? क्या लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने की छूट किसी को दी जा सकती है?

Sanjay Sharma

दिल्ली समेत कई राज्यों में बढ़ते प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने पलारी जलाने की एक भी घटना न होने देने की हिदायत राज्य सरकारों की दी। साथ ही निर्माण कार्य कराने या ढहाने पर एक लाख और कूड़ा फेंकने व जलाने पर पांच हजार का जुर्माना लगाने का प्रावधान किया है। कोर्ट ने दिल्ली में लागू ऑड-इवेन योजना पर रिपोर्ट भी तलब की है। सवाल यह है कि बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट को सख्त आदेश क्यों देने पड़े? क्या राज्य सरकारें प्रदूषण को लेकर गंभीर नहीं है? क्या लोगों के जीवन की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की नहीं है? क्या प्रदूषण को खत्म करना नामुमकिन है? सत्ताधारी पार्टियां इस पर सियासत क्यों कर रही हैं? क्या लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने की छूट किसी को दी जा सकती है? क्या दीर्घकालीनरणनीति के बिना प्रदूषण को समाप्त किया जा सकता है?
दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब खतरनाक वायु प्रदूषण की चपेट में हैं। दिल्ली गैस चेंबर में तब्दील हो गई है। एनसीआर समेत यूपी के तमाम शहरों की हवा जहरीली हो चुकी है। लखनऊ देश का चौथा सबसे प्रदूषित शहर बन गया है। प्रदूषण अब घर तक पहुंच चुका है। लोगों को सांस लेने में दिक्कत हो रही है। पिछले डेढ़ दशकों से इन राज्यों में सर्दियों के मौसम में प्रदूषण से हालात खराब हो रहे हैं लेकिन सरकारें हाथ पर हाथ धरे बैठीं हैं। सत्ताधारी पार्टियां एक-दूसरे पर इसका ठीकरा फोडक़र अपनी सियासत चमकाने में लगी हैं। प्रदूषण को खत्म करने के लिए कोई ठोस रणनीति आज तक नहीं बनाई जा सकी है। हां, ये सरकारें कुछ फौरी कार्रवाई कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री जरूर कर लेती हैं। इसके लिए किसानों द्वारा जलाई जाने वाली पलारी को कारण बताया जा रहा है जबकि अन्य कारण भी भयानक प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं। मसलन, सडक़ पर दौड़ते पुराने डीजल वाहन, निर्माण कार्यों से उड़ती धूल व कारखानों से निकलता धुआं इसकी बड़ी वजहें हैं। धूल और धुआं नमी पाकर प्रदूषण को खतरनाक स्तर पर पहुंचा देते हैं। जाहिर है सरकारों को प्रदूषण से निपटने के लिए न केवल दीर्घकालीन रणनीति बनानी होगी बल्कि उसको जमीन पर उतारने का तंत्र भी विकसित करना होगा। किसानों की पलारी के समुचित निस्तारण की व्यवस्था भी करनी होगी। सत्ताधारी पार्टियों को सियासत को दरकिनार कर इसके खिलाफ एकजुटता से लड़ाई लडऩी होगी। इस मामले में केंद्र और राज्य सरकारों को ब्रिटेन और चीन से सबक लेना होगा। इन दोनों देशों ने प्रदूषण के खिलाफ मुहिम चलाकर अपने शहरों को प्रदूषण से लगभग मुक्त कर दिया है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो प्रदूषण जानलेवा साबित होगा।

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