रेलवे में निजीकरण की दस्तक के निहितार्थ

सवाल यह है कि निजीकरण का भारतीय रेलवे पर क्या असर पड़ेगा? क्या सरकारी व निजी रेल तंत्र के बीच भविष्य में स्वस्थ्य प्रतिस्पर्धा उत्पन्न होगी? क्या लेट लतीफी, असुरक्षा और अव्यवस्थाओं के लिए मशहूर हो चुकी भारतीय रेलों का कायाकल्प हो सकेगा? क्या निजी रेलों के संचालन के तौर-तरीकों से भारतीय रेल प्रशासन सबक सीखेगा?

SAnjay sharma

भारतीय रेलवे में निजीकरण ने दस्तक दे दी है। लखनऊ से दिल्ली के बीच शुरू हुई पहली कारपोरेट ट्रेन तेजस ने इसकी बुनियाद रख दी। तेजस पूरी तरह अत्याधुनिक सुविधाओं और सुरक्षा उपकरणों से लैस है। यात्रियों के बीमा के साथ ट्रेन के लेट होने पर मुआवजा देने का भी प्रावधान किया गया। सवाल यह है कि निजीकरण का भारतीय रेलवे पर क्या असर पड़ेगा? क्या सरकारी व निजी रेल तंत्र के बीच भविष्य में स्वस्थ्य प्रतिस्पर्धा उत्पन्न होगी? क्या लेट लतीफी, असुरक्षा और अव्यवस्थाओं के लिए मशहूर हो चुकी भारतीय रेलों का कायाकल्प हो सकेगा? क्या निजी रेलों के संचालन के तौर-तरीकों से भारतीय रेल प्रशासन सबक सीखेगा? क्या सेमीस्पीड ट्रेनों के संचालन के लिए रेलवे पुख्ता इंतजाम करेगी? क्या ट्रेन हादसों पर लगाम लग सकेगी? क्या गंदगी के अंबार बन चुके तमाम रेलवे स्टेशनों में तब्दीली आएगी? क्या भारतीय रेल व्यवसायिककरण के ट्रैक पर दौड़ पाएगी? क्या भारतीय रेलवे को निजीकरण से लाभ मिलेगा?
भारतीय रेलवे दुनिया की चौथी सबसे बड़ी रेल सेवा है। यह प्रतिवर्ष एक अरब टन माल ढोती है। यात्री व मालवाहक ट्रेनों की संख्या 19 हजार से अधिक हैं और इसमें हर साल-दर-साल इजाफा हो रहा है। प्रतिदिन लाखों यात्री एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करते हैं। बावजूद इसके भारतीय रेल अव्यवस्था का शिकार है। तमाम स्टेशनों और टै्रकों पर गंदगी बिखरी रहती है। शायद ही कोई ट्रेन टाइम पर उपलब्ध होती हो। दूर से आने वाली ट्रेनें घंटों लेट रहती हैं। ट्रेन के अंदर फायर उपकरण नदारद रहते हैं। तमाम टै्रक जर्जर स्थिति में हैं जिसके चलते कई हादसे हो चुके हैं। ट्रेन में मिलने वाले खाने की गुणवत्ता बेहद खराब होती है। यात्रियों की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। चलती ट्रेनों में वारदातें बढ़ती जा रही हैं। यह तब है जब ट्रेनों में जवान तैनात होते हैं। अब जब पहली प्राइवेट टे्रन तेजस ट्रैक पर दौडऩे लगी है तो भारतीय रेल के कायाकल्प की उम्मीद भी जगी है। तेजस की सुविधाओं और सुरक्षा को देखते हुए भारतीय रेलवे को भी खुद में सुधार करने होंगे। भारतीय रेलवे को यात्रियों के प्रति खुद को जवाबदेह बनाना होगा। साथ ही ट्रेनों के कुशल और सुरक्षित संचालन को भी सुनिश्चित करना होगा। लेट-लतीफी और विभाग में व्याप्त भ्रष्टïाचार पर लगाम लगानी होगी। यदि ऐसा नहीं हुआ तो रेल का यह निजीकरण भारतीय रेलवे को पीछे धकेल देगा क्योंकि यात्री समय, सुविधा और सुरक्षा के हिसाब से बेहतर ट्रेनों का चयन करेंगे। लिहाजा भारतीय रेलवे को अब स्वस्थ्य प्रतिस्पर्धा में उतरना ही पड़ेगा। यदि ऐसा हुआ तो न केवल रेलवे घाटे से उबर जाएगी बल्कि इसका पूरा कायाकल्प भी हो जाएगा।

 

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