प्लास्टिक, पर्यावरण और सरकारी तंत्र

सवाल यह है कि क्या जन सहयोग के बिना देश को प्लास्टिक से मुक्त किया जा सकता है? क्या प्लास्टिक की वस्तुओं के उत्पादक कारखानों को बंद किए बिना यह संभव है? क्या लालफीताशाही पर्यावरण संरक्षण के आड़े नहीं आ रही है? प्रतिबंध के बावजूद यूपी में प्लास्टिक के कैरीबैग्स का प्रयोग क्यों हो रहा है? क्या पर्यावरण संरक्षण के लिए लगाए गए पौधों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई है?

Sanjay Sharma

महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर प्रधानमंत्री मोदी, मंत्रियों और नेताओं ने प्लास्टिक का प्रयोग न करने की अपील कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। स्वच्छता अभियान चलाया गया। पीएम ने सिंगल यूज प्लास्टिक को स्वच्छता, पर्यावरण व पशुओं के लिए खतरा बताते हुए इससे देश को 2022 तक मुक्त करने का लक्ष्य भी निर्धारित किया। सवाल यह है कि क्या जन सहयोग के बिना देश को प्लास्टिक से मुक्त किया जा सकता है? क्या प्लास्टिक की वस्तुओं के उत्पादक कारखानों को बंद किए बिना यह संभव है? क्या लालफीताशाही पर्यावरण संरक्षण के आड़े नहीं आ रही है? प्रतिबंध के बावजूद यूपी में प्लास्टिक के कैरीबैग्स का प्रयोग क्यों हो रहा है? क्या पर्यावरण संरक्षण के लिए लगाए गए पौधों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई है? क्या स्वच्छता अभियान के नाम पर महज दिखावा नहीं हो रहा है? क्या खुले में शौच से देश मुक्त हो चुका है? क्या गंदगी फैलाने की मानसिकता दूर की जा सकी है?
प्लास्टिक पृथ्वी के पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है। भारत में भी स्थितियां बिगड़ चुकी हैं। प्लास्टिक से न केवल गंदगी फैल रही है बल्कि यह खेतों व पशुओं के लिए भी हानिकारक साबित हो रही है। भूगर्भ तक बारिश का जल नहीं पहुंच पा रहा है, इससे भारत समेत दुनिया के कई शहरों का भूगर्भ जल खत्म होने की कगार पर पहुंच चुका है। जाहिर है अब खतरे को टाला नहीं जा सकता है। इसमें दो राय नहीं कि केंद्र व राज्य सरकारें इस संकट को गंभीरता से ले रही हैं। उत्तर प्रदेश में 50 माइक्रान से कम के प्लास्टिक कैरीबैग्स पर प्रतिबंध है। शहरों की साफ-सफाई के निर्देश नगर निगमों व नगर पालिकाओं को दिए गए हैं। पौधरोपण किया जा रहा है। बावजूद इसके स्थितियां सुधरने का नाम नहीं ले रही है। लखनऊ में प्लास्टिक के कैरीबैग्स और बोरियों का धड़ल्ले से उपयोग हो रहा है। सडक़ों, बाजारों और गलियों में गंदगी फैली है। देखरेख के अभाव में हजारों पौधे सूख गए है। जब राजधानी में यह हाल है तो अन्य जिलों का अंदाजा लगाया जा सकता है। हकीकत यह है कि लालफीताशाही के चलते सरकार का संकल्प जमीन पर उतरता नहीं दिख रहा है। प्लास्टिक के खिलाफ खानापूर्ति के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं। कूड़ा उठान और निस्तारण की समुचित व्यवस्था नहीं है। लोग खुले में शौच करते नजर आते हैं। कई इलाकों में प्लास्टिक के कैरीबैग्स बनाए जा रहे है। यदि सरकार पर्यावरण का संरक्षण करना चाहती है तो उसे न केवल प्लास्टिक के खिलाफ लगातार अभियान चलाना होगा बल्कि आम आदमी को भी जागरूक करना होगा। साथ ही संबंधित विभाग को जवाबदेह भी बनाना होगा।

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