स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता का सवाल

सवाल यह है कि तमाम कवायदों के बावजूद यूपी में स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार क्यों नहीं हो रहा है? क्या शिक्षा विभाग में व्याप्त भ्रष्टïाचार और लापरवाही इसकी बड़ी वजह है? क्या बेहतर शिक्षकों की कमी ने स्कूली शिक्षा का हाल बेहाल कर दिया है? प्राथमिक स्कूल बुनियादी जरूरतों से क्यों जूझ रहे हैं? मिड-डे-मील योजना के बाद भी बच्चों की उपस्थिति में बढ़ोतरी क्यों नहीं हो पा रही है?

Sanjay Sharma

नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट ने उत्तर प्रदेश के स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता की पोल खोल दी है। गुणवत्ता के मामले में देश के बीस बड़े राज्यों में केरल पहले और यूपी अंतिम पायदान पर है। शिक्षा की गुणवत्ता में केरल को 76.6 प्रतिशत और यूपी को 36.4 फीसदी अंक मिले हैं। बच्चों की सीखने की क्षमता, शिक्षा तक पहुंच, स्कूलों में बुनियादी ढांचा व सुविधाएं, सभी बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान और स्कूल प्रशासन की कार्यशैली को रिपोर्ट का आधार बनाया गया है। सवाल यह है कि तमाम कवायदों के बावजूद यूपी में स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार क्यों नहीं हो रहा है? क्या शिक्षा विभाग में व्याप्त भ्रष्टïाचार और लापरवाही इसकी बड़ी वजह है? क्या बेहतर शिक्षकों की कमी ने स्कूली शिक्षा का हाल बेहाल कर दिया है? प्राथमिक स्कूल बुनियादी जरूरतों से क्यों जूझ रहे हैं? मिड-डे-मील योजना के बाद भी बच्चों की उपस्थिति में बढ़ोतरी क्यों नहीं हो पा रही है? क्या सरकार को स्कूली शिक्षा में आमूल परिवर्तन लाने की जरूरत नहीं है?
प्रदेश में कई हजार प्राथमिक विद्यालय स्कूली शिक्षा दे रहे हैं। इन स्कूलों में बच्चों को मुफ्त ड्रेस और किताबें उपलब्ध कराने का प्रावधान है। बच्चों की उपस्थिति बढ़ाने के लिए मिड-डे-मील जैसी योजना लागू की गई है। बावजूद इसके इन स्कूलों में बच्चों की मौजूदगी कम रहती है। जो बच्चे आते हैं उनकी शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जाता है। बच्चों के बैठने के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। बच्चों को समय पर किताबें और ड्रेस नहीं मिल पाती है। कई स्कूलों में शिक्षक समय से नहीं पहुंचते है और वे पढ़ाने से ज्यादा शिक्षक राजनीति में रूचि लेते हैं। मिड-डे-मील जैसी योजना अव्यवस्था का शिकार हो चुकी है। बच्चों को निर्धारित मेन्यू के आधार पर भोजन नहीं उपलब्ध कराया जाता है। ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं। प्राथमिक स्कूलों के तमाम भवन जर्जर हैं। कई स्कूलों में शौचालयों और खेल के मैदान का अभाव है। बारिश में स्कूलों में पानी भर जाता है और बच्चों के संक्रमित होने का खतरा बना रहता है। शिक्षा विभाग सब कुछ जानते-बूझते इस मामले में कोई ठोस कदम नहीं उठाता है। सच यह है कि स्कूली बच्चों के लिए चलाई जा रही तमाम योजनाएं भ्रष्टïाचार की भेंट चढ़ चुकी है। स्कूल शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। वहीं शिक्षकों की ड्यूटी पढ़ाई के अलावा अन्य कार्यों में भी लगाई जाती है, इसके कारण शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है। जाहिर है यदि सरकार स्कूली शिक्षा में अव्वल आना चाहती है तो उसे केरल की शिक्षा व्यवस्था से सीख लेकर कठोर सुधारात्मक कदम उठाने होंगे और शिक्षा विभाग को भ्रष्टïाचार से भी मुक्त करना होगा।

 

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