क्यों खुदकुशी कर रहे छात्र?

सवाल यह है कि छात्रों में खुदकुशी की प्रवृत्ति बढ़ती क्यों जा रही है? क्या पढ़ाई समेत तमाम दबावों ने छात्रों के जीवन को बोझ बना दिया है? क्या गलाकाट प्रतिस्पर्धा और भौतिकवाद की अंधी दौड़ के कारण आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है? क्या संवादहीनता ने अवसाद को बढ़ा दिया है? छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ क्यों रहा है?

Sanjay Sharma

प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 19 वर्ष के एक मैकेनिकल इंजीनियरिंग के छात्र ने खुदकुशी कर ली। इससे कुछ दिन पहले कक्षा आठ की एक छात्रा ने पांचवीं मंजिल से कूद कर अपनी जान दे दी। ये दोनों घटनाएं सभ्य समाज को चिंतित करने के लिए काफी हैं। सवाल यह है कि छात्रों में खुदकुशी की प्रवृत्ति बढ़ती क्यों जा रही है? क्या पढ़ाई समेत तमाम दबावों ने छात्रों के जीवन को बोझ बना दिया है? क्या गलाकाट प्रतिस्पर्धा और भौतिकवाद की अंधी दौड़ के कारण आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है? क्या संवादहीनता ने अवसाद को बढ़ा दिया है? छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ क्यों रहा है? क्या समाज और सरकार को इस पर गंभीरता से चिंतन करने की जरूरत नहीं है? क्या देश के नौनिहालों के जीवन को बचाने की जिम्मेदारी समाज और सरकार की नहीं है?
पूरे देश में छात्रों द्वारा आत्महत्या करने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। इसके कई कारण हैं। अधिकांश छात्र फेल होने या इसकी आशंका पर खुदकुशी कर लेते हैं। पढ़ाई का बोझ और बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने स्थिति को विस्फोटक बना दिया है। माता-पिता की इच्छा को पूरी करने में नाकाम छात्र आत्महत्या कर रहे हैं, लेकिन ये कारण इसका केवल एक पक्ष है। सच यह है कि समाज में संवादहीनता बढ़ती जा रही है। संयुक्त परिवार के विघटन व एकल परिवार के चलन ने समस्या को बढ़ा दिया है। शहरों में नौकरी पेशा दंपति बच्चों का ध्यान नहीं रख पाते हैं। ऐसी स्थिति में बच्चा अपने मनोभाव व समस्याओं को साझा नहीं कर पाता है। वह धीरे-धीरे अवसाद की चपेट में आ जाता है। इस अवसाद के कारण उसे अपना जीवन बोझ लगने लगता है और वह खुद को समाप्त करने जैसा घातक कदम उठा लेता है। कई बार माता-पिता अपने सपनों को बच्चे के जरिए साकार करना चाहते हैं। वे बच्चे पर उसकी इच्छा के विरुद्ध पढ़ाई या अन्य कोर्स का दबाब बनाते है। इससे बच्चा उस कोर्स को करने में खुद को असमर्थ पाता है। वह खुद से जूझता है। इसके चलते उसके भीतर गहरे अवसाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। यह स्थिति भी घातक होती है। हैरानी की बात यह है कि सरकार भी बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर कम ध्यान देती है। जाहिर है, यदि सरकार और समाज नौनिहालों को खुदकुशी से बचाना चाहते हैं तो उसे खुद में बदलाव लाना होगा। माता-पिता को जहां अपने बच्चों से बराबर संवाद बनाए रखना होगा वहीं उनकी समस्याओं का समाधान भी करना होगा। दूसरी ओर सरकार को भी समय-समय पर बच्चों के मानसिक परीक्षण करने की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। ऐसा होने पर ही नौनिहालों को असमय मौत के मुंह से बचाया जा सकता है।

 

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