अव्यवस्थाओं के बोझ से कराहते शहर और तंत्र

सवाल यह है कि शहर अव्यवस्थाओं का शिकार क्यों हो रहे हैं? नगर निगम और नगर पालिकाएं क्या कर रही हैं? शहरों को दुरुस्त रखने के लिए हर साल जारी होने वाला भारी-भरकम बजट कहां जा रहा है? क्या शहरों की इस दुर्दशा के लिए भ्रष्टïाचार और लापरवाही जिम्मेदार है? नागरिकों से कर वसूलने के बाद भी सरकार उन्हें सुविधाएं क्यों नहीं मुहैया करा पा रही है? क्या पूरा तंत्र पंगु हो चुका है?

SAnjay Sharma

्रदेश के शहर अव्यवस्थाओं के बोझ से कराह रहे हैं। इनकी बदहाली विकास के दावों की पोल खोल रही है। बुनियादी सुविधाओं का ऐसा बंदोबस्त है कि सबकुछ अस्त-व्यस्त है। जलभराव, दूषित पेयजल, जाम, जगह-जगह से उखड़ी सडक़ें और बढ़ते प्रदूषण ने शहरवासियों का जीना मुहाल कर दिया है। सवाल यह है कि शहर अव्यवस्थाओं का शिकार क्यों हो रहे हैं? नगर निगम और नगर पालिकाएं क्या कर रही हैं? शहरों को दुरुस्त रखने के लिए हर साल जारी होने वाला भारी-भरकम बजट कहां जा रहा है? क्या शहरों की इस दुर्दशा के लिए भ्रष्टïाचार और लापरवाही जिम्मेदार है? नागरिकों से कर वसूलने के बाद भी सरकार उन्हें सुविधाएं क्यों नहीं मुहैया करा पा रही है? क्या पूरा तंत्र पंगु हो चुका है? क्या पूरी व्यवस्था को बदले बिना शहरों की स्थितियों में सुधार की संभावना नहीं है? क्या ऐसे ही शहर स्मार्ट बनेंगे?
प्रदेश में शहरों का तेजी से विस्तार हो रहा है। तमाम गांव उनकी जद में आ चुके हैं। लोगों की बसावट बढ़ रही है। निजी और सरकारी संस्थाएं बिल्डिंगें बनाकर मुनाफा कमाने में जुटी हैं। बावजूद इसके बुनियादी सुविधाएं बेपटरी हैं। राजधानी लखनऊ का हाल तक बेहाल है। कुछ पॉश कॉलोनियों को छोड़ दें तो अधिकांश शहर में अव्यवस्थाओं का डेरा है। सडक़ों पर सीवर का गंदा पानी बह रहा है। कई जगहों पर सडक़ों में बड़े-बड़े गड्ढे हैं। शहरवासी दूषित पेयजल पीने को मजबूर है। पेयजल के दर्जनों नमूनों का फेल होना, इसकी पुष्टिï करते हैं। पानी की निकासी का आलम यह है कि बारिश के दिनों में पूरा शहर पानी-पानी हो जाता है। पुराने लखनऊ की हालत और भी बदतर है। यातायात व्यवस्था चरमरा चुकी है। तमाम इलाकों में रोजाना जाम लगता है। बाजार से लेकर गलियों तक में गंदगी का साम्राज्य है। खाली प्लाट कूड़े के डंपिंग ग्राउंड में तब्दील होते जा रहे हैं। कूड़ा उठान और निस्तारण में घोर लापरवाही बरती जा रही है। रही सही कसर अतिक्रमण ने निकाल दी है। अमीनाबाद जैसे इलाके वर्षों से अतिक्रमण की चपेट में हैं। विकास के तमाम दावों के बावजूद स्थितियों में सुधार होता नहीं दिख रहा है। प्रदूषण लोगों की सेहत पर विपरीत असर डाल रहा है। छोटे बच्चे और युवक तक श्वांस रोग और एलर्जी की चपेट में आ रहे हैं। यह स्थिति तब है जब शहर को सुव्यवस्थित रखने की जिम्मेदारी नगर निगम को सौंपी गई है और इसके लिए हर साल करोड़ों रुपये का बजट जारी किया जाता है। सरकार यदि शहर को स्मार्ट बनाना चाहती है तो उसे इन अव्यवस्थाओं को समाप्त करना होगा और इसके लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करनी होगी। साथ ही भ्रष्टïाचार को भी खत्म करना होगा।

 

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