सोशल मीडिया पर कोर्ट की सख्ती के मायने

सवाल यह है कि सोशल मीडिया पर शीर्ष अदालत को सख्त रुख क्यों अपनाना पड़ रहा है? क्या बिना कोर्ट के आदेश के जनहित के मुद्दों पर कानून बनाने के लिए सरकार गंभीर नहीं है? क्या सोशल मीडिया पर रोक लगाना नामुमकिन है? क्या यह कानून व्यवस्था के लिए घातक बनती जा रही है? क्या सोशल मीडिया को कानून के प्रति जवाबदेह बनाने की जरूरत नहीं है?

Sanjay Sharma

सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया के बढ़ते दुरुपयोग पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने सरकार से न केवल इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए तीन सप्ताह में गाइडलाइन तय करने को कहा है बल्कि इस मामले में किसी प्रकार की बहानेबाजी से बचने का भी आदेश दिया है। सवाल यह है कि सोशल मीडिया पर शीर्ष अदालत को सख्त रुख क्यों अपनाना पड़ रहा है? क्या बिना कोर्ट के आदेश के जनहित के मुद्दों पर कानून बनाने के लिए सरकार गंभीर नहीं है? क्या सोशल मीडिया पर रोक लगाना नामुमकिन है? क्या यह कानून व्यवस्था के लिए घातक बनती जा रही है? क्या सोशल मीडिया को कानून के प्रति जवाबदेह बनाने की जरूरत नहीं है?
इंटरनेट की शुरुआत के बाद पूरी दुनिया में सोशल मीडिया तेजी से लोकप्रिय हो रही। फेसबुक, व्हाट्स एप, ट्विटर और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफार्म आम आदमी को सोशल मीडिया से जोड़ रहे हैं। इसके जरिए न केवल खबरों का तीव्र गति से आदान-प्रदान हो रहा है बल्कि लोग अपने मनोभाव भी खुलकर व्यक्त कर रहे हैं। भारत में करीब 40 करोड़ लोग व्हाट्स एप, तीस करोड़ फेसबुक व सात करोड़ इंस्टाग्राम का प्रयोग कर रहे हैं। वहीं इस वर्ष के अंत तक इंटरनेट यूजर्स की संख्या 63 करोड़ हो जाएगी। सोशल मीडिया को स्मार्ट फोन व सस्ते इंटरनेट डाटा ने भी पंख लगा दिए हैं। दरअसल, सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की आजादी को एक नया आयाम दिया है। वहीं इसका एक काला पन्ना भी है। इसके तमाम प्लेटफार्म का दुरुपयोग बढ़ता जा रहा है। इसके जरिए न केवल लोगों की निजता का हनन हो रहा है बल्कि अफवाहों और फर्जी वीडियो के जरिए जनता को गुमराह भी किया जा रहा है। पिछले दिनों बच्चा चोर गिरोह के सक्रिय होने की अफवाह सोशल मीडिया पर उड़ाई गई। लिहाजा भीड़ उग्र हो गई व बिना जाने-समझे लोगों को निशाना बनाने लगी। कई लोगों को बच्चा चोर के नाम पर पीटा गया। कई इस कदर घायल हो गए कि उन्होंने दम तोड़ दिया। वहीं इसके जरिए आतंकियों को भी गुपचुप तरीके से संदेश भेजा जाता है। हाल में पाकिस्तान ने कश्मीर को लेकर सोशल मीडिया का जमकर दुरुपयोग किया और कश्मीर में फर्जी अत्याचार के वीडियो जारी किए। यही वजह है कि सोशल मीडिया को लेकर कोर्ट ने अपने तेवर कड़े कर लिए हैं। हालांकि कोर्ट ने साफ कर दिया है कि गाइडलाइन नागरिकों की निजता और देश की संप्रभुता को ध्यान में रखकर बनायी जाए। जाहिर है सरकार यदि कानून व्यवस्था को दुरुस्त रखना चाहती है तो उसे न केवल सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए ठोस प्रयास करने होंगे बल्कि उसे कानून के प्रति जवाबदेह भी बनाना होगा।

 

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