पर्यावरण संरक्षण का संकल्प और चुनौतियां

सवाल यह है कि क्या दुनिया के तमाम देश यह संकल्प तय समय सीमा में पूरा कर सकेंगे? क्या बड़े देशों के सहयोग के बिना पृथ्वी के पर्यावरण की रक्षा संभव है? क्या वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों को व्यापक रूप से अपनाए बिना कार्बन उत्सर्जन को कम किया जा सकता है? क्या भारत इस चुनौती से आसानी से निपट सकेगा?

Sanjay Sharma

संयुक्त राष्टï्र के जलवायु आपदा शिखर सम्मेलन में दुनिया के साठ से अधिक देशों ने पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया। इन राष्टï्रों ने 2050 तक कार्बन डाईऑक्साइड के शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने की मंशा जताई। हालांकि अभी सिर्फ बीस देशों ने अपने राष्टï्रीय कानून में इसे शामिल किया है। यूरोपीय संघ में इस पर अगले वर्ष सहमति बनने की उम्मीद है। सवाल यह है कि क्या दुनिया के तमाम देश यह संकल्प तय समय सीमा में पूरा कर सकेंगे? क्या बड़े देशों के सहयोग के बिना पृथ्वी के पर्यावरण की रक्षा संभव है? क्या वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों को व्यापक रूप से अपनाए बिना कार्बन उत्सर्जन को कम किया जा सकता है? क्या भारत इस चुनौती से आसानी से निपट सकेगा? क्या पर्यावरण संरक्षण के लिए सभी देशों को एक साथ ठोस कदम उठाने होंगे?
पूरी दुनिया पर्यावरण प्रदूषण की चपेट में है। ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती जा रही है और इसकी सबसे बड़ी वजह कार्बन का बेतहाशा उत्सर्जन है। प्रदूषण के कारण पृथ्वी के अस्तित्व पर संकट छा गया है। कई देशों में पेयजल की किल्लत हो चुकी है। मरूस्थलीकरण बढ़ रहा है और ग्लेशियर पिघलते जा रहे हैं। यदि ग्लेशियरों के पिघलने की यही रफ्तार रही तो समुद्र का जलस्तर बढ़ जाएगा और इसके किनारे बसे कई शहर जलसमाधि ले लेंगे। कई नदियां सूख जाएंगी। ऐसे में पर्यावरण संरक्षण के लिए अभी नहीं तो कभी नहीं वाली स्थिति उत्पन्न हो चुकी है। जहां तक भारत का सवाल है, यहां कोयले से बिजली उत्पादन के चलते 68 फीसदी कार्बन उत्सर्जित होता है। पानी की कमी के कारण फसलों को जलाने की बढ़ती प्रवृत्ति ने इसकी मात्रा को बढ़ा दिया है। चीन और अमेरिका कार्बन उत्सर्जन में सबसे आगे हैं। दोनों देश इसमें कटौती करने को तैयार नहीं दिखते हैं। विश्व के तमाम देशों का दबाव पडऩे के कारण 2017 में अमेरिका ने तो पेरिस जलवायु समझौते से खुद को अलग करने तक का ऐलान कर दिया था। हालांकि भारत इस पर ठोस कार्रवाई शुरू कर चुका है। उसका फोकस गैर परंपरागत उर्जा पर है। यही वजह है कि भारत कार्बन उत्सर्जन में 12 फीसदी की कमी लाने में कामयाब रहा। वन क्षेत्रों को भी बढ़ाया जा रहा है। दूसरी ओर पर्यावरण संरक्षण के लिए विश्व के सभी देशों को आगे आना होगा। इसके लिए कोयले के प्रयोग को घटाना और अक्षय ऊर्जा स्रोतों से बिजली उत्पादन को बढ़ाना होगा। वनों के दायरे में इजाफा करना होगा। बावजूद इसके यह तभी सफल होगा जब बड़े और शक्तिशाली देश इस संकल्प को पूरा करने में सहयोग करेंगे। यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह संकल्प कभी साकार नहीं हो पाएगा और पृथ्वी अपने विनाश की ओर बढ़ती जाएगी।

 

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