बाढ़ पर लकीर पीटती सरकारें

सवाल यह है कि हर वर्ष आने वाली विनाशकारी बाढ़ से बचने का स्थायी हल आज तक सरकारें क्यों नहीं निकाल पाईं? आपदा प्रबंधन, शिविर और राहत सामग्री का वितरण जैसे पुराने उपायों की लकीर हर बार क्यों पीटनी पड़ रही है? क्या नदियों को विनाशकारी बनने से बचाने का कोई उपाय नहीं है? क्या बाढ़ के मूल कारणों को जाने बिना इसका स्थायी समाधान निकाला जा सकता है?

Sanjay Sharma

आधा भारत बाढ़ की चपेट में है। फसलें नष्टï हो रही हैं। सैकड़ों घर तबाह हो गए हैं। अरबों की संपत्ति खत्म हो चुकी है। लाखों लोग राहत शिविरों में शरण लेने को बाध्य हैं। यूपी का पूर्वांचल भी इससे अछूता नहीं है। यहां तीन सौ गांव बाढ़ की चपेट हैं। सरकार राहत सामग्री का वितरण करने में लगी है। इन सबके बावजूद कुछ प्रश्न अभी अनुत्तरित हैं। सवाल यह है कि हर वर्ष आने वाली विनाशकारी बाढ़ से बचने का स्थायी हल आज तक सरकारें क्यों नहीं निकाल पाईं? आपदा प्रबंधन, शिविर और राहत सामग्री का वितरण जैसे पुराने उपायों की लकीर हर बार क्यों पीटनी पड़ रही है? क्या नदियों को विनाशकारी बनने से बचाने का कोई उपाय नहीं है? क्या बाढ़ के मूल कारणों को जाने बिना इसका स्थायी समाधान निकाला जा सकता है? क्या सरकारें बाढ़ से होने वाली जान-माल के नुकसान को लेकर गंभीर नहीं हैं? आखिर नदियां इतनी विनाशकारी क्यों होती जा रही हैं? क्या बेतरतीब विकास ने इस प्राकृतिक आपदा को भयानक नहीं बना दिया है?
भारत में बाढ़ हर वर्ष आती है। गंगा, यमुना, ब्रह्मïपुत्र, घाघरा, चंबल, नर्मदा जैसी नदियां हर बार विनाशलीला करती हैं। इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। दरअसल, बाढ़ के समय नदियां अपने साथ मिट्टी, रेत और कंकड़ बहाकर लाती है। यह तलछट नदियों के तल में लगातार जमा होता रहता है। इसके कारण नदियां उथली होती जा रही हैं। लिहाजा नदियों के पानी धारण करने की क्षमता कम होती जा रही है। ऐसे में वे बारिश के दौरान अचानक उफना जाती हैं। इसके अलावा देश भर में बनाए गए बांध भी नदियों को विनाशकारी बना देते हैं। बारिश के दौरान अतिरिक्त पानी को नदियों में छोड़ दिया जाता है। इससे पहले से लबालब नदियां इस पानी को गांवों और खेतों तक पहुंचा देती हंै और बाढ़ के हालात पैदा हो जाते हैं। शहरीकरण भी बाढ़ के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। बड़ी-बड़ी इमारतों को बनाने के चक्कर में तालाबों और पोखरों को पाट दिया गया है। इसके कारण शहर और बारिश का सारा पानी नदियों में पहुंच रहा है। नदियों की धारा मोडऩे की कोशिशें भी विनाश का कारण है। सरकार यदि बाढ़ को नियंत्रित करना चाहती है तो उसे दीर्घकालीन रणनीति बनाकर नदियों के तल में जमा तलछट को साफ करना होगा ताकि उनके पानी भरण की क्षमता बढ़ सके। साथ ही तालाबों और पोखरों को संरक्षित करने के साथ उनका निर्माण कराना होगा। अन्यथा हर साल बाढ़ जान-माल का नुकसान करती रहेगी और आपदा राहत के कारण सरकारी खजाने पर भी इसका असर पड़ेगा। यह देश और प्रदेश के विकास की रफ्तार को कम कर देगा।

 

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