आओ खेलें वार्ता-वार्ता

अपने देश में एक बात बहुत अच्छी है। यहां बातें कभी खत्म नहीं होतीं। बात से बात निकलती है और लोग वार्ता का रस लेते रहते हैं। इन बातों के चक्कर में समाधान कभी नहीं होता। अब एक पुराने मंदिर मामले में फिर बतकही शुरू होने वाली है। तीन महीने तक बात करते रहे। कोई हल नहीं निकला। कोई किसी की बात सुनने को तैयार नहीं हुआ। मामला कोर्ट पहुंच गया। बातूनियों ने कह दिया, साहब हमारे बस का हल निकालना नहीं है। हमसे तो बस बातें करा लो। बातों में हम प्रकांड हैं। वह तो नींद आ जाती है वरना बातों का सिलसिला हम मरते दम तक न तोड़े। अब जब हल निकलने की बात आई तो इनका पेट फिर पानी होने लगा। भाई ऐसे काम नहीं चलेगा। एक बार फिर बात होनी चाहिए। हल आज नहीं तो कल निकल जाएगा लेकिन बातों का रस फिर नहीं मिलेगा। सो लोगों ने अपनी यह इच्छा कोर्ट को भी सुना दी। अब जज साहब मानने को तैयार नहीं है। साफ कह दिया है आप बातचीत करिए। हमें कोई एतराज नहीं है लेकिन हम तो अपना फैसला सुनाकर रहेंगे। इसे कहते हैं बातें गांठना।

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