पर्यावरण संरक्षण पर मंथन के मायने

सवाल यह है कि क्या सेमिनारों और अधिवेशनों से पर्यावरण संरक्षण संभव है? क्या विशेषज्ञों द्वारा समस्या व उसका निदान बता देना काफी है? क्या दुनिया के सभी देशों द्वारा इस पर एक रोड मैप तैयार करने और उसको जमीन पर उतारे बिना स्थितियों में बदलाव लाया जा सकता है? क्या कॉप अधिवेशन दुनिया के देशों को संदेश देने में कामयाब हो पाएगा?

SAnjay Sharma

संयुक्त राष्ट्र के कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज यानी कॉप के 14वें अधिवेशन में पर्यावरण संरक्षण पर मंथन किया जा रहा है। कई दिनों तक चलने वाले इस अधिवेशन में दुनिया के 80 देशों के प्रतिनिधि और विशेषज्ञ शिरकत कर रहे हैं। खुद पीएम मोदी ने जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण पर भारत की ओर से किए जा रहे प्रयत्नों को रेखांकित किया। साथ ही दुनिया को पर्यावरण संरक्षण के लिए अपना नजरिया बदलने का आह्वïान भी किया। सवाल यह है कि क्या सेमिनारों और अधिवेशनों से पर्यावरण संरक्षण संभव है? क्या विशेषज्ञों द्वारा समस्या व उसका निदान बता देना काफी है? क्या दुनिया के सभी देशों द्वारा इस पर एक रोड मैप तैयार करने और उसको जमीन पर उतारे बिना स्थितियों में बदलाव लाया जा सकता है? क्या कॉप अधिवेशन दुनिया के देशों को संदेश देने में कामयाब हो पाएगा? क्या अन्य देश भी भारत की तर्ज पर पर्यावरण संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाएंगे? क्या आने वाली पीढिय़ों को एक बेहतर पर्यावरण देने का संकल्प पूरा हो सकेगा?
पृथ्वी की जलवायु तेजी से बदल रही है। इसका सबसे बड़ा कारण पर्यावरण प्रदूषण है। पर्यावरण संरक्षण के लिए दुनिया भर के तमाम देशों ने आवाज उठाई, लेकिन स्थितियां बिगड़ती ही जा रही हैं। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ग्लेशियरों के लुप्त होने का खतरा बढ़ गया है। ग्लैशियर पिघलते जा रहे हैं। ग्लेशियरों की ठोस बर्फ कार्बन को जमीन में संरक्षित करती है। उनके पिघलने से जमीन में संरक्षित कार्बन भी नष्ट हो जाता है। मध्य हिमालयी क्षेत्र में पाए जाने वाले घास के मैदान पर भी भूक्षरण का असर पड़ रहा है। यहां पशुओं को चारे के लिए छोड़ दिया जाता है। इससे यहां के खास तरह के पौधे दुर्लभ होते जा रहे हैं, जो मरुस्थलीकरण की बड़ी वजह बन रहे हैं। यदि इसका जल्द निराकरण नहीं हुआ तो हिमालय का बहुत बड़ा हिस्सा ठंडे मरुस्थल में तब्दील हो जाएगा। ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है। इससे समुद्र के किनारे बसे कई देशों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं विकराल रूप लेती जा रही है। जंगलों को तेजी से काटा जा रहा है। इसके कारण वायु प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। दुनिया के कई शहरों में भूगर्भ जल खतरनाक स्तर तक घट चुका है और वहां पानी का अकाल पड़ सकता है। जाहिर है यदि आने वाली पीढ़ी को बेहतर पर्यावरण उपलब्ध कराना है कि तो बिना देरी किए दुनिया के तमाम देशों को मिलकर पर्यावरण संरक्षण पर त्वरित गति से काम करना होगा। यदि ऐसा हुआ तो यह कॉप सम्मेलन की सफलता होगी अन्यथा यह अधिवेशन भी इतिहास में दर्ज होकर रह जाएगा।

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