जनता की सेहत से खिलवाड़ और तंत्र

सवाल यह है कि कड़े कानूनों के बावजूद खाद्य प्रतिष्ठïानों के संचालकों के हौसले बुलंद क्यों हैं? खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन इन पर शिकंजा कसने में नाकाम क्यों है? क्या यह धंधा मिलीभगत से चल रहा है? क्या प्रतिष्ठïानों में मानकों की लगातार निगरानी नहीं की जाती है? केवल नोटिस देकर अधिकारी अपने कर्तव्यों की इतिश्री क्यों कर रहे हैं?

SAnjay sharma

पिछले दिनों छापेमारी के दौरान राजधानी की एक नामचीन मिठाई की दुकान के किचन में गंदगी के बीच मिठाइयां बनती मिली। वहां रखे घी में मक्खियां पड़ी थीं और फर्श पर सीवर बह रहा था। सब्जियों और अन्य खाद्य सामग्री में फफूंद लगी थी। वहां सोडियम नाइट्रेट सल्फाइड केमिकल भी मिला। इसका प्रयोग मिठाइयों को ताजा रखने में किया जाता है। इससे साफ है कि होटल, रेस्त्रां, ढाबे और मिठाई के दुकानों के संचालक लोगों की सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं। सवाल यह है कि कड़े कानूनों के बावजूद खाद्य प्रतिष्ठïानों के संचालकों के हौसले बुलंद क्यों हैं? खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन इन पर शिकंजा कसने में नाकाम क्यों है? क्या यह धंधा मिलीभगत से चल रहा है? क्या प्रतिष्ठïानों में मानकों की लगातार निगरानी नहीं की जाती है? केवल नोटिस देकर अधिकारी अपने कर्तव्यों की इतिश्री क्यों कर रहे हैं? क्या लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने की छूट दी जा सकती है? क्या सरकार खाद्य पदार्थों में मिलावट और इसके गुणवत्ता में हो रही अनदेखी पर गंभीर नहीं है?
राजधानी की ताजा घटना बेहद गंभीर है। खराब हो चुकी और मिलावटी खाद्य सामग्री से बनाई जा रही वस्तुओं को बाजारों में धड़ल्ले से बेचा जा रहा है। केमिकल के जरिए मिठाइयों और सब्जियों को ताजा बनाया जा रहा है। मसालों से लेकर तेल तक में मिलावट हो रही है। खाद्य पदार्थों को गंदगी में बनाया जा रहा है। ऐसी खाद्य सामग्री का लंबे समय तक सेवन घातक हो सकता है। गंदगी में बनी खाद्य सामग्री व्यक्ति के शरीर में संक्रमण उत्पन्न कर सकती है। हैरानी की बात यह है कि कड़े कानूनों के बाद भी संचालकों को कोई डर नहीं है। वे इतने बेखौफ है कि कई बार नोटिस का जबाव तक नहीं देते हैं। जब राजधानी में यह स्थिति है तो दूसरे जिलों का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। यह हाल तब है जब खाद्य सामग्री में मिलावटखोरी रोकने और इसकी गुणवत्ता बनाए रखने के लिए खाद्य सुरक्षा और औषिध प्रशासन विभाग है। सरकार इस पर हर साल लाखों खर्च करती है। हकीकत यह है कि यह सारा धंधा मिलीभगत से चल रहा है। संबंधित विभाग कभी-कभी छापेमारी अभियान चलाता है। टीम कुछ नमूने भरती है और जांच के लिए भेज कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती है। बहुत हुआ तो नोटिस भेज देती है। सरकार यदि मिलावटखोरी और खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को बनाए रखना चाहती है तो उसे सतत निगरानी प्रणाली विकसित करनी होगी। मिलावटी व खराब खाद्य पदार्थों की बिक्री करने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करनी होगी। अन्यथा ये मुनाफे के लालच में लोगों की सेहत से खिलवाड़ करते रहेंगे।

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