दूषित पेयजल, लापरवाह सिस्टम और सवाल

सवाल यह है कि प्रदूषित पेयजल की आपूर्ति के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या सरकार नागरिकों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने में नाकाम साबित हो रही है? क्या व्यवस्था में व्याप्त लापरवाही और भ्रष्टïाचार के चलते स्थितियां बेकाबू होती जा रही हैं? क्या लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने की छूट दी जा सकती है? क्या इस मामले में सरकार कोई ठोस कदम उठाएगी?

Sanjay Sharma

राजधानी लखनऊ में लोगों को शुद्ध पेयजल नसीब नहीं हो रहा है। पिछले दिनों विभिन्न इलाकों से लिए गए पानी के नमूने जांच में फेल मिले हैं। पानी में घातक वैक्टीरिया भी मिले हैं। ये सेहत के लिए बेहद नुकसानदायक हैं। कई इलाकों में गंदे पानी की आपूर्ति जारी है। सवाल यह है कि प्रदूषित पेयजल की आपूर्ति के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या सरकार नागरिकों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने में नाकाम साबित हो रही है? क्या व्यवस्था में व्याप्त लापरवाही और भ्रष्टïाचार के चलते स्थितियां बेकाबू होती जा रही हैं? क्या लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने की छूट दी जा सकती है? क्या इस मामले में सरकार कोई ठोस कदम उठाएगी?
शहर के अधिकांश इलाकों में पेयजल के नमूनों का फेल होना गंभीर चिंता का विषय है। जांच में पानी को शुद्ध करने वाली क्लोरिन की मात्रा नहीं मिली है। पेयजल में कॉलीफार्म वैक्टीरिया मिला है। यह जांच स्वास्थ्य व जलकल विभाग की टीम ने खुद किया है। रिपोर्ट के मुताबिक शहर के हजरतगंज, इंदिरानगर, फैजुल्लागंज, डालीबाग समेत कई इलाकों का पानी दूषित है। टीम ने अप्रैल से जून माह के बीच भी नमूने लिए थे। इनमें 173 जांच में फेल मिले थे। हजरतगंज में लिए गए नमूने में घातक वैक्टीरिया मिले हैं। जाहिर है, पाइप लाइनों के जरिए घरों में दूषित पानी की आपूर्ति की जा रही है। दूषित जल से पेट में संक्रमण फैल जाता है और वैक्टीरिया लिवर को खराब कर सकता है। यह स्थिति तब है जब लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए हर वर्ष करोड़ों रुपये का बजट जारी किया जाता है। लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी जलकल विभाग को सौंपी गई है लेकिन लगता है विभाग को लोगों की सेहत की कोई चिंता नहीं है। यही नहीं शिकायतों के बावजूद व्यवस्था को दुरुस्त करने में हीलाहवाली की जाती है। जब प्रदेश की राजधानी में यह हाल है तो अन्य जिलों की स्थितियों का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। स्पष्टï है शहर की पेयजल आपूर्ति में घनघोर लापरवाही बरती जा रही है और लोगों की सेहत से जमकर खिलवाड़ किया जा रहा है। यह हाल तब है जब नागरिकों से बाकायदा वाटर टैक्स वसूला जाता है। दूषित पेयजल की आपूर्ति कर संबंधित विभाग न केवल नागरिक अधिकारों बल्कि उपभोक्ता नियमों की भी अनदेखी कर रहा है। यदि सरकार नागरिकों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना चाहती है तो उसे न केवल पूरी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन करना होगा बल्कि इसकी सतत निगरानी करनी होगी। साथ ही इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी सुनिश्चित करनी होगी।

 

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